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गौतम बुद्ध का जीवन परिचय एवं उपदेश |महात्मा बुद्ध |तथागत बुद्ध | Gautam Guddha Quotes in Hindi

विरक्त-प्रम्परा में गौतम बुद्ध एक अत्यन्त वैभवशाली नाम है, जिसकी बड़ाई करना सूरज को दीएक दिखाना है, जिसके ज्ञान और साधना की गंगा में विश्व का बहुत बड़ा क्षेत्र प्रभावित है, आर्नल्ड’ के शब्दों में जो लाइट आफ एशिया है, धर्म के उस महान अनुशास्ता का वहां थोड़ा परिचय प्रस्तुत है।

गौतम बुद्ध

Table of Contents

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय एवं उपदेश |महात्मा बुद्ध |तथागत बुद्ध | Gautam Guddha

बचपन का नाम सिद्धार्थ
जन्म लुम्बनी (नेपाल ) 563 B.C.
माता का नाम मायादेवी
पिता का नाम सुद्धोधन
धर्मं बौद्ध धर्मं
पत्नी का नाम यशोधरा
बच्चेराहुल
मुख्य शिष्य आनन्द
उत्तराधिकारी मैत्रेय
निधन कुशीनगर , भारत 483 A.D. ( 80 वर्ष की आयु में )

गौतम बुद्ध का जन्म|Birth of Gautam Buddha

तथागत बुद्ध का प्रथम नाम सिद्धार्थ था। शाक्यवंशीय राजा सुद्धोधन ‘कपिलवस्तु में राज कर रहे थे जो उत्तर भारत में आज के बस्ती के उत्तर स्थित था।

ईसा के 563 वर्ष के पहले बैसाख महीने की पूर्णिमा के दिन राजा सुद्धोधन तथा माता महामायादेवी के गर्भ से सिद्धार्थ नामक बच्चा उत्तरी भारत के लुम्बनी वन में पैदा हुआ, जब गर्भवती रानी महामाया देवी अपनी सखियों तथा रक्षकों के साथ अपने पिता के घर जा रही थी। जन्म से सात दिन के बाद माता मायादेवी का देहान्त हो गया। अतएव मां की बहिन (सौतेली मां) महाप्रजापति गौतमी ने बच्चे का पालन किया।

सिद्धार्थ की चिंतनशीलता और वैराग्य

राजा सुद्धोधन के एक हजार हल चल रहे थे। एक दिन कृषि सम्बन्धी उत्सव था। राजा स्वयं हल चला रहे थे। बालक सिद्धार्थ जामुन-पेड़ के नीचे पलथी मार, आंखें बन्द कर समाधि में लग गया। यह देखकर सब आश्चर्य में पड़ गये। सिद्धार्थ चितनशील और मननशील थे। वे अपना समय हास-परिहास में नहीं बिताते थे। उनकी इस गम्भीरता से राजा सुद्धोधन डरने लगे। वे सदैव शंकालु बने रहते थे कि इस बुढ़ापा में जन्मा होनहार इकलौता लड़का कहीं वबैरागी न हो जाये। राजा ने राजकुमार सिद्धार्थ के चारों ओर भोगों की सामग्री सजा रखी थी और ऋतुओं के अनुसार उनके लिए अनेक महल बनवा रखे थे।

राजकुमार सिद्धार्थ अनेक जन्मों के शुद्ध संस्कारी थे; अत: छोटी-छोटी घटनाओं से भी उनको बड़ा मोड़ मिलता था। एक बार उनके चचेरे भाई देवदत्त ने एक हंस को बाण मार दिया। हंस को पीड़ा तथा उसके स्वजनों को व्याकुलता देखकर सिद्धार्थ करुणा से भर गये और प्राणियों पर उनकी वह करुणा जीवनपर्यंत बरसती रही।

सुन्दरी राजकुमारी यशोधरा से सिद्धार्थ का विवाह हुआ था। सिद्धार्थ की गम्भीर दशा देखकर यशोधरा ने हर प्रयत्न से सिद्धार्थ पर अपना मायाजाल ‘फेंककर उनको मोहित करने की चेष्टा की थी। सिद्धार्थ को एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसको हम राहुल के नाम से जानते हैं। पुत्र उत्पन्न होने के बाद से सिद्धार्थ को विशेष उदासीनता रहने लगी। वे विचारते थे कि राज्य, धन, पती ये सब बन्धन के कारण थे ही, पुत्र तो निश्चय ही मार्ग का बड़ा रोड़ा है। पुत्र ग्रसने वाला ‘राहु’ है इसलिए लड़के का नाम “राहुल” रखा। उनके अन्दर वैराग्य की आग सुलग रही थी।

कहा जाता है कि जब एक दिन उन्होंने रोगी, वृद्ध और मृतक को देखा तब उनके मन में एकदम उथल- पुथल हो गयी। वे एकांत में अपने आप से पूछने लगे–“’क्या मैं भी रोगी तथा बूढ़ा हो जाऊंगा? क्या में भी एक दिन मर जाऊंगा? और जब एक दिन मरना है तब यह सब किस काम का? क्‍यों न में सत्य की खोज करूं? क्‍यों न में रोग, बुढ़ापा और मौत से छुटकारा लेने का रास्ता पकड़ूं?” आग लगी हो और उसमें घी पड़ जाये तो क्‍या पूछना? सिद्धार्थ को किसी साधु के गीत सुनाई पड़े-

नरपूंगव जन्ममृत्यु भीतः
श्रमण: प्रव्रजितोस्मि मोक्षहेतो:

अर्थात–हे नर श्रेष्ठ जन्म-मरण के भय से, उससे छूटने के लिए मैंने प्ब्रज्या ले ली हे, मै सन्यासी हो गया हूँ ।” उपर्युक्त सारी बातें गौतम के विवेकी मन को मथती रही होंगी। किन्तु निम्न घटना ने उन्हें पूर्ण विरक्त बना दिया।

शाक्यसंघ में हर शाक्यवंशी की अपने बीस वर्ष की उम्र में दीक्षा होती थी और उसे शाकयों की सभा में यह व्रत लेना पड़ता था कि वह अपने तन, मन तथा धन से शाक्यों के स्वार्थ की रक्षा करेगा, संघ की सभाओं में उपस्थित रहेगा, बिना किसी भय और पक्षपात के किसी भी शाक्य का दोष कह देगा, उस पर कोई दोष लगाये तो दोष होने पर उद्बवेश रहित होकर स्वीकार लेगा और दोष न होने पर वैसा कह देगा। यदि वह व्यभिचार, हत्या और चोरी करेगा तथा झूठी साक्षी देगा तो संघ का सदस्य न रह सकेगा। सिद्धार्थ गौतम 20 वर्ष की उम्र में शाक्य संघ के सदस्य बन गये तथा तत्परतापूर्वक अपने व्रत का पालन करते हए अपने 28 वर्ष की उम्र तक व्यतीत किये।

शाक्यों और कोलियों की राज्यसीमा की विभाजक रेखा रोहिणी नदी थी। दोनों उसी से अपने खेत सींचते थे। दोनों रिश्तेदार थे और आये दिन पानी को लेकर परस्पर झगड़े की स्थिति में आ जाते थे। जब गौतम की उम्र अट्ठाइस वर्ष की हुई तब शाक्य और कोलियों में पानी को लेकर विवाद हुआ। शाकयों ने कोलियों से युद्ध करने का मन बनाया।

प्रमुख बौद्ध स्थल

गौतम ने इसका विरोध किया कि युद्ध से दोनों तरफ के हित की हानि होती है। परंतु अधिसंख्यक शाक्य युद्ध के समर्थन में एक मत हो गये।

सेनापति ने शाक्य युवकों को सेना में भरती होने के लिए आमंत्रित किया। शाक्यों के नियम के अनुसार गौतम के सामने तीन विकल्प थे-(१) सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना, (2) फांसी पर लटकना या देश निकाला स्वीकार करना अथवा (3) उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार होना और उनके खेतों का जब्त कर लिया जाना। गौतम ने बीच वाला विकल्प पसंद किया-घर से निकल जाना।

शाक्य-नरेश साकेत-नरेश के अधीन रहते थे। सेनापति ने कहा कि आप देश से निकल जायेंगे तो साकेत-नरेश हम लोगों को दंडित करेगा कि तुम लोगों ने गौतम को निकाला है। गौतम ने कहा कि में सन्यासी बनकर निकलूंगा, इससे आप लोगों पर दोष नहीं लगेगा।

गौतम ने पिता और माता गौतमी से अपना लक्ष्य बताया। वे दोनों दुखी और मूक थे। यशोधरा ने जो गौतम की पत्नी थीं, गौतम के विचारों का समर्थन किया और गौतम घर तथा राज्य छोड़कर संन्यासी हो गये।!

“अक्तदण्डा भर्व जात, जन॑ पस्सथ मेधक॑।
संवेगं कित्तविस्सामि वा संविजितं मया ॥ । ॥
फन्दमानं य्ज दिस्वा मच्छे अप्पोदके वथा।
अज्यमज्जेहि व्यारखे दिस्वा में भवमाविसि ॥ 2 ॥
समन्तसरों लोकों, दिस्सा सब्बा समेरिता।
इच्छे॑ भवनमत्तनों नादसासि अनोसित॑।
ओमसाने त्वेव व्यारुद्दे दिस्‍या मे अरति अहु॥ 3 ॥

सिद्धार्थ अपने वैराग्य उदय होने के सम्बन्ध में स्वयं कह रहे हैं-

अर्थात–शस्त्र धारण करना भयावह लगा। (उससे) यह जनता कैसे झगड़ती है देखा। मुझमें संवेग (वेराग्य) कैसे उत्पन्न हुआ यह मै बताता हूं ॥ 1॥
अपर्याप्त पानी में जैसे मछलियां छटपटाती हैं; वैसे एक दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे अंतःकरण में भय उत्पन्न हुआ ॥ 2॥
चारों ओर का जगत असार दिखाई देने लगा। दसों दिशाएं कांप रही है ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया ॥ 3 ॥

वे और कहते हैं–

“किसी भी बुद्धिमान के लिए राज्याधिकार कैसे उचित हो सकता है, जहां
चिंता है, राग-द्वेष है, क्लांति है और है दूसरों के प्रति अन्याय ।””

वे आगे कहते हैं–‘सोने का महल तो लगता है जैसे उसमें आग लगी
है। अच्छे-से-अच्छे भोजन विष मिले प्रतीत होते हैं और कमलों के फूल से
सजी शय्या पर लगता है जैसे मगरमच्छ लोट रहे हों।””

महात्मा बुद्ध

सिद्धार्थ की अवस्था उस समय 29 वर्ष की थी। आषाढ़ पूर्णिमा (उत्तराषाढ़ नक्षत्र) की रात को सिद्धार्थ ने घर से निकलकर छंदक नामक सेवक को जगा कर सवारी लाने को कहा। सेवक कंथक नामक घोड़े को लाया। सिद्धार्थ उस पर बैठकर रात-ही-रात तीस योजन दूर अनोमा नदी पर पहुंचे।

सत्य की खोज, तप और बुद्धत्व प्राप्ति

बोधगया में महाबोधि मंदिर

सिद्धार्थ नदी में घोड़े सहित उतर गये। छंदक घोड़े की पूंछ पकड़कर साथ-साथ नदी पार गया। सिद्धार्थ ने अपना राजसी वस्त्र उतारकर छंदक को दे दिया और अपनी कटार से अपने राजसी बाल काट डाले। छंदक भी साथ- साथ साधु होना चाहा; परन्तु सिद्धार्थ ने उसे घोड़ा सौपकर वापस लौटा दिया, और कहा कि जब तक मैं बुद्धत्व (सिद्धि) न प्राप्त कर लूंगा, कपिलवस्तु न लौटूंगा ।

सिद्धार्थ ने अनोमा नदी के पार अनूपिया नामक कस्बे के आम के वन में एक सप्ताह व्यतीत किया। वे पुनः वहां से तीस योजन चलकर राजगृह पहुंचे। राजगृह मगध की राजधानी थी।

सिद्धार्थ राजगृह में अनेक घरों से भिक्षा मांगकर एक पर्वत के पास भोजन करने बैठे। उस भोजन में अनेक घरों की सामग्री होने से वह विचित्र हो गया था। सिद्धार्थ ने जब मुख में कौर डाला तब उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि मानो भीतर से आंत ही निकल आयेगी। उनको वह भोजन रुचिकर नहीं लग रहा था।

तुरन्त उनको विवेक जाग्रत हो गया और वे अपने आप को धिक्कारने लगे–“सिद्धार्थ! तूने अन्नपान सुलभ कुल में तीन वर्ष के पुराने सुगंधित चावल का भोजन किये जाने वाले स्थान में पैदा होकर भी, गुदरीधारी भिक्षु को देखकर सोचा था कि में भी कब इसी तरह भिक्षु बनकर भिक्षा मांग भोजन करूंगा, क्या वह भी समय होगा I और यही सोच घर से निकला था। अब यह क्‍या कर रहा है!”

इस प्रकार उन्होंने अपने आप को समझाकर तथा निर्विकार भाव होकर भोजन किया। उस समय “राजगृह” का राजा “बिम्बसार’ सिद्धार्थ को मिला और उन्हें घर लौट जाने को कहा; परन्तु जब उन्हें दृढ़ देखा तब कहा कि मुझे पुन: दर्शन दीजियेगा।

सिद्धार्थ वहां से चलकर एक वन में गये जहां अनेक ऋषिगण साधना में लगे थे। वे सांख्यमतवादी ‘आलार कालाम” तथा वैशेषिकवादी ‘ उद्दक-राम- पुत्र” के पास कुछ-कुछ दिन रहे तथा समाधि-अभ्यास सीखे, परन्तु उन्हें सन्तोष न हुआ | उन्होंने दूसरे अनेक तपस्वियों के पास जाकर उनकी श्रद्धापूर्वक सेवा की, उनके निर्देशानुसार तपस्या की; परन्तु उनको उनसे भी संतोष न होने से उन तापसों से विनम्रता प्रकट करते हुए आगे बढ़ते रहे।

वे भ्रमण करते हुए ‘उरुवेला” पहुंचे। तप करने लगे। वहां पांच तापस साधु मिले। वे सिद्धार्थ के पास रहने लगे और छहों ने छह वर्ष निरन्तर तप किया। सिद्धार्थ का शरीर तप से सूख गया और काला पड़ गया। एक दिन वे घूमते समय निर्बलता से गिर पड़े। उन्होंने तप में सार नहीं देखा और पुन: गाँव से भिक्षा लेकर खाने लगे तथा कुछ दिनों में स्वस्थ हो गये। इधर पांच साथी तपस्वियों ने सिद्धार्थ को समझा कि यह तो तप छोड़कर देह पालने लगा हे, अत: वे उनका साथ छोड़कर ऋषिपत्तन (सारनाथ-वाराणसी) वन में चले गये।

सिद्धार्थ को यह अनुभव हुआ कि अधिक तप ठीक नहीं है। उन्होंने एक सुजाता नाम की बुढ़िया के हाथ की खीर खायी और निरंजना नदी के तट पर एक पीपल पेड़ के नीचे ध्यान में सात सप्ताह व्यतीत किये। उन्हें एक रात्रि प्रात: होने के पहले ज्ञान का रास्ता दिखाई दिया और उनको पूर्ण शांति मिली। उस दिन से वे तथागत तथा बुद्ध कहलाने लगे। जो सत्य को पा जाये उसका नाम तथागत तथा ज्ञानवान को बुद्ध कहते हें।

सात सप्ताह के बाद ‘तपसु! तथा ‘भल्लिक’ नाम के दो व्यापारी उत्कल (उड़ीसा) के पश्चिम जा रहे थे। उन्होंने तथागत बुद्ध को भोजन कराया तथा उनसे दीक्षा ली। वे महात्मा बुद्ध के प्रथम दो गृहस्थ शिष्य हुए।

बौद्ध धर्म प्रचार | Buddhism

तथागत बुद्ध ने सोचा कि मैंने जो ज्ञान ग्राप्त किया है उसका लोगों में प्रचार करूं। परन्तु पुनः: उनको संदेह हुआ कि काम, क्रोध तथा राग-द्वेष से मलिन मानव मेरी बातों पर क्‍या ध्यान देगा! अत: यह झमेला छोड़कर शांत रहें। परन्तु पुन: विचार हुआ कि इस संसार रूपी घोर रात्रि में कुछ लोग शुद्ध संस्कारी हैं जो जाग रहे हैं और वे पथप्रदर्शन चाहते हैं। इसलिए उन्होंने सोचा कि पहले मैं अपने पूर्व गुरुओं “आलार कालाम” तथा “उद्दक-राम-पुत्र” को उपदेश दूं और वे इसके लिए चले; परन्तु रास्ते में पता चला कि उनका देहांत हो गया है।

धर्म प्रचार (Source- Wikipedia )

अत; उन्होंने पुन: सोचा, चलो हम अपने पंचवर्गीय तपस्वी मित्रों को ही क्‍यों न चेतावेंI अत; वे ऋषिपत्तन (सारनाथ) आ गये और प्रथम बार उन साधुओं को उपदेश दिया जिसको महात्मा बुद्ध का प्रथम ‘धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। वे पांचों तपस्वी बुद्ध के शिष्य हो गये। तथागत बुद्ध सारनाथ में ही वर्षावास किये और उन्होंने अन्य 55 साथकों को दीक्षा दी। इस प्रकार सब 60 भिक्षु हो गये। वर्षा बाद सबको विभिन्न प्रदेशों में भेजकर स्वयं ‘उरुवेला की ओर चल पड़े।

तथागत बुद्ध ने पथ में अनेक लोगों को शिक्षा-दीक्षा दी। उरुवेला के ‘काश्यप आदि तीन जटिल भाइयों को प्रभावित कर उन्हें शिष्य बनाया।

तथागत बुद्ध ने राजा “बिम्बसार’ की पूर्व प्रार्थना का स्मरण कर कि मुझे “पुनः दर्शन दीजियेगा’ ‘राजगृह” की ओर प्रस्थान कर दिया। वे लट्टिवन-उद्यान में पहुंचे। माली द्वारा पता पाकर राजा बिम्बसार महात्मा बुद्ध से मिलने आया। साथ में ब्राह्मणों का एक बड़ा दल था।

ब्राह्मणों ने देखा कि बुद्ध के साथ में उरुवेला का महान ब्राह्मण काश्यप भी है। वे इस चक्कर में पड़ गये कि काश्यप तथा बुद्ध–दोनों में कौन गुरु एवं कौन शिष्य है! यह बात तथागत बुद्ध समझ गये। अतएव ब्राह्मणों के भ्रम को मिटाने के लिए उन्होंने काश्यप से कहा–“काश्यप! क्‍या समझकर तुमने आग छोड़ी? क्‍यों अग्निहोत्र त्यागा?”’

काश्यप ने कहा–‘भगवन! यज्ञ से भौतिक भोग मिलना बताया जाता हे; परन्तु यह मल है, विकार है। अतः में इनसे विरक्त होकर रहता हूं। मैं न यज्ञ करता हूं न हवन।”

राजा बिम्बसार ने तथागत बुद्ध को अपने उद्यान में ठहराया। राजगृह के पास ही दो महान परित्राजक ब्राह्मण सारिपुत्र तथा मौदगल्यायन रहते थे और वे अविनाशी वस्तु की खोज में थे। वे दोनों तथागत बुद्ध के शिष्य हो गये।

तथागत वेणुबन में विहार करते थे, साथ में विशाल शिष्य-मंडली रहती थी। तथागत बुद्ध का प्रचार जोरों से चला। ‘सारिपुत्र” तथा ‘मौदगल्यायन’ जैसे उत्तम ब्राह्मण, आनन्द” तथा “देवदत्त” जैसे क्षत्रिय कुमार, ‘तपस्सु’ और “भल्लिक’ जैसे वैश्य और “उपलिस’ जैसे शूद्र कहे जाने वाले उनके शिष्य हुए। उनके यहां किसी के लिए भेदभाव न था।

राजा सुद्धोधन ने जब अपने पुत्र की महिमा सुनी कि वे एक बड़े महात्मा हुए हैं और अपने ज्ञान से बड़े-छोटे–सभी लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, तब उनके पुत्र-वियोग का घाव भरने लगा और आगे चलकर उनका मन बहुत प्रसन्न हुआ। उन्हें सिद्धार्थ के वियोग में जितना दुख हुआ था, उनकी ज्ञान- महिमा सुनकर उतनी ही शांति मिली।

अब राजा सुद्धोधन के मन में यह व्याकुलता रहने लगी कि कब महात्मा बुद्ध के दर्शन होंगे। कहा जाता है कि उन्होंने बारी-बारी अपने नौ मंत्रियों को एक-एक हजार राजकर्मचारियों के साथ वेणुबन बुद्ध को बुलाने के लिए भेजा और सब जाकर बुद्ध के पास भिक्षु (साधु) बन गये। जो बुद्ध के पास जाता वह इतना प्रभावित होता कि उसे अपने घर, कपिलवस्तु राजधानी एवं राजा के संदेश की ही सुधबुध खो जाती।

जब नौ हजार कर्मचारियों के साथ नौ मंत्रियों ने लौटकर कोई संदेश न दिया तब राजा बहुत घबराये और एक “कालउदायी” नामक मंत्री को अपने पास बुलाया जो बुद्ध का बालसाथी था। राजा ने ‘कहा–तुम जाकर महात्मा बुद्ध को लाओ और हमें उनके दर्शन करा दो। “कालउदायी” ने कहा–यदि आप मुझे प्रत्रज्या लेने (साधु होने) की आज्ञा दें तो मैं जाऊं। राजा ने कहा-अरे भाई! जा, उनको लाकर दर्शन करा दे, फिर पीछे तेरा जो मन कहेगा वह हो जाना।

“कालउदायी” ने मगध जाकर तथागत बुद्ध को कपिलवस्तु चलने की प्रार्थना की और एक हजार कर्मचारियों के साथ भिक्षु बन गया। कहा जाता है इस प्रकार 10 हजार तो कपिलवस्तु के भिक्षु तथा 10 हजार पहले के मगध के भिक्षु–सब 20 हजार भिक्षुओं सहित बुद्ध कपिलवस्तु राजधानी में पहुंचे। इसमें घोर अतिशयोक्ति है, परन्तु महात्मा बुद्ध के समय साधु बनने की बाढ़ अवश्य थी।

राजा सुद्धोधन ने बुद्ध का अभिवादन किया, स्वागत किया, किन्तु अन्य शाक्यवंशीय क्षत्रिय लोगों ने घर के लड़कों और युवकों से बुद्ध का अभिवादन तथा स्वागत कराया। वे स्वयं अभिमान-वश अभिवादन नहीं कर सके। उनमें कोई सोचता “बुद्ध तो मेरा भतीजा है, कोई कहता मेरा पौत्र हे, कोई कहता मेरा तो छोटा भाई लगता है, में उसका कैसे नमस्कार करूं।” सत्संग पाकर पीछे से क्षत्रिय लोग विनम्र हुए और उनका शिष्यत्व तक स्वीकार किये।

तथागत बुद्ध को न्यग्रोध नामक स्थान में ठहराया गया। पहले दिन की सभा समाप्त हुई। राजा, मंत्री तथा दूसरे लोग भी अगले दिन के लिए तथागत बुद्ध को भिक्षा के लिए निमंत्रण नहीं दिये, क्योंकि वे निमंत्रित ही थे।

तथागत बुद्ध दूसरे दिन भिक्षुओं सहित राजधानी में घूम-घूमकर भिक्षा मांगना आरम्भ किये। यशोधरा ने अट्टालिका के झरोखों से देखा “’तथागत बुद्ध भिक्षा मांग रहे हें। राहुल की माता यशोधरा सोचती हैं “जो सोने की पालकी पर चलते थे, वे मूड़ मुड़ाये भिक्षा मांग रहे हें । वे दौड़ी-दौड़ी राजा के पास आयी और कहने लगीं आपके पुत्र घर-घर भिक्षा मांग रहे हें।

राजा धोती सम्हालते हुए राजभवन से दौड़ पड़े और तथागत बुद्ध के पास पहुंच गये और उन्होंने उनसे कहा–सुगत! क्या हम भिक्षुओं को भोजन नहीं दे पाते? तथागत बुद्ध ने कहा-हमारे कुल की यही रीति है। राजा ने कहा-न न, कभी शाक्यवंशी भीख नहीं मांगते। बुद्ध ने कहा–राजन! आपके शाक्यवंश में अवश्य भीख नहीं मांगी जाती; किन्तु मेरे बुद्धवंश में भिक्षा ही की जाती है।

सब लोग मिलने आये; परन्तु राहुल की माता यशोधरा यह कहकर मिलने नहीं आयीं कि भगवन स्वयं कृपा करके दर्शन देंगे। बुद्ध अपने शिष्यों के सहित यशोधरा के भवन में उनसे मिलने गये और उन्होंने शिष्यों को समझा दिया कि यशोधरा जिस प्रकार मिलना चाहेगी मिलने देना, कोई उन्हें रोकना नहीं।

राहुल की माता जबसे सुनी थीं कि सिद्धार्थ काषाय वस्त्र धारण कर लिये हैं तन से वे भी काषाय वस्त्र धारण करने लगी थीं। इसी प्रकार एक समय भोजन करना, जमीन पर सोना तथा राजसुखों का त्याग कर देना-ये सब तपस्या के गुण यशोधरा में पूर्ण हो गये थे।

यशोधरा ने तथागत बुद्ध से प्रभावित होकर राहुल से कहा कि अपने पिता से आशीर्वाद मांगो। तथागत बुद्ध ने राहुल को भी दीक्षा देकर अपने संघ में मिला लिया। साथ-साथ राजघराने के अनेक युवक तथा नाई भी उनकी शरण लेकर भिक्षु हो गये। तथागत बुद्ध का जनता पर अमिट छाप पड़ी। जो कोई उनके सामने जाता था उनका हो जाता था। श्रावस्ती (गोण्डा से उत्तर) के सेठ अनाथ पिंडक ने बौद्ध विहार बनवाने के लिए साकेतनरेश से जेतवन नामक बाग को उतने मोहर देकर खरीदा जितने से वह बाग ढक जाता।

बुद्ध से प्रभावित होकर कोसलनरेश ‘प्रसेनजित” एवं सेठानी ‘विशाखा” उनके शिष्य हुए। तथागत बुद्ध एक बार बीमार हुए। मगध राजवैद्य जीवक उनकी चिकित्सा करने आये और उलटकर उन्हीं की चिकित्सा हो गयी और वे तथागत बुद्ध के शिष्य हो गये। ‘जीवक” राजगृह की प्रमुख वेश्या के पुत्र थे। वेश्या ने उस बच्चे के पैदा होते ही उसे घूर पर फेंकवा दिया था। उसे एक राजपुरुष ने पाला था। जीवक बड़ा होने पर तक्षशिला विश्वविद्यालय में जाकर वैद्यक की शिक्षा पाये थे और बहुत बड़ा वैद्य हुआ था।

तथागत बुद्ध ने राजाओं के बीच उठे हुए युद्ध को भी शांत किया था। एक उदाहरण काफी है। एक बार शाक्यों और कोलियों में नदी के पानी को लेकर विवाद खड़ा हो गया और तलवारें खिंच गयीं। तथागत बुद्ध ने दोनों को ऐसा उपदेश दिया कि दोनों गले मिले।

नारियों का संघ में प्रवेश

पहले चर्चा कर आये हैं कि सिद्धार्थ को पालने-पोषने वाली प्रजापति गौतमी थीं। जब राजा सुद्धोधन मर गये तब गौतमी ने भिक्षुणी की दीक्षा चाही। तथागत बुद्ध ने उन्हें समझाया कि नारियों को घर में ही रहकर साधना करनी चाहिए। उनका भिक्षुणी होना आवश्यक नहीं है और न यह भिक्षुओं के लिए हितकर है। परन्तु वे आग्रह करती रहीं। तथागत बुद्ध के श्रेष्ठ शिष्यों में से आनन्द ने गौतमी के लिए जोर दिया कि इन्हें भिक्षुणी की दीक्षा मिलनी चाहिए। महात्मा बुद्ध ने, अन्दर से न चाहते हुए भी आनन्द के अति आग्रह-वश प्रजापति गौतमी को दीक्षा दी; और फिर तो खुलेआम महिलाएं, भिक्षुणी बनने लगीं। तथागत बुद्ध ने कहा था-‘आनन्द! यदि नारियों को संघ में न लिया जाता तो संघ हजार वर्ष चलता; परन्तु यह जो नारियों को संघ में मिला लिया गया है, संघ का पांच सौ वर्ष ही चलना बहुत है।’ और यह उनकी भविष्यवाणी अक्षरश: सिद्ध हुई।

उनकी समता दृष्टि

तथागत बुद्ध समता की महान मूर्ति थे। एक बार वे भ्रमण करते हुए वैशाली पहुंचे । वहां की प्रसिद्ध वेश्या आम्रपाली उनके दर्शन के लिए आयी। उसने उन्हें निमंत्रण दिया और तथागत बुद्ध उसे स्वीकार कर उसके घर गये और उसका आतिथ्य स्वीकार किये। इस बात को लेकर लोगों ने विरोध किया; परन्तु तथागत बुद्ध ने जरा भी नहीं माना। उन्होंने कहा हमारे लिए सब बराबर हैं।

उनकी सहनशीलता

एक बार एक राजा यज्ञ कर रहा था जिसमें सैकड़ों बकरे कटने वाले थे। तथागत बुद्ध ने राजा के पास जाकर कहा-“यदि बकरों की बलि देने से मनुष्य को स्वर्ग मिलता है तो मनुष्य की बलि देने से और उत्तम स्वर्ग मिलेगा। अत: इन बकरों की बलि न देकर मेरी बलि दे दी जाये।” राजा ने यह बात सुनकर उनकी शरण ले ली और बकरों को छोड़वा दिया।

तथागत बुद्ध त्याग, वैराग्य, समता, शांति, करूणा और मानवता की महान मूर्ति थे, तो भी दुष्ट लोगों ने उनको सताने की बड़ी चेष्टा की। सांप्रदायिक उद्घेग से विरोधियों ने उनको नीचा दिखाने के लिए दुराचारिणी स्त्रियों द्वारा उनको लांछित किये जाने का उपक्रम किया, परन्तु सूर्य पर थूकने पर जो गति होती हे वही विरोधियों की हुई।

एक बार श्रावस्ती में विरोधियों ने एक भिक्षुणी की हत्या करके यह प्रचार किया कि बुद्ध के चेले ऐसे दुष्ट हें कि वे एक भिक्षुणी से व्यभिचार करके उसकी हत्या कर दिये हें। इसको लेकर प्रजा में भिक्षुओं के प्रति अश्रद्धा हो गयी। सर्वत्र भिक्षुओं को ताने सुनने पड़ते। तथागत बुद्ध ने भिक्षुओं को समझाया–भिक्षुओ! ये अन्धकार के बादल थोड़े दिन हें। वास्तविकता दस दिन में प्रकट हो जायेगी। तुम लोग उद्वेग-रहित रहो। जब तुम्हें कोई देखकर तुम्हारा अपमान करे, तुम्हें गाली दे, तब तुम उससे कहो–“झूठ बोलने वाले नरक में जाते हैं और जो करके कहते हैं कि मैंने नहीं किया वे भी नरक में जाते हैं।” धीरे-धीरे वास्तविकता खुल गयी। भिक्षुओं को लोग श्रद्धा से देखने लगे।

‘कोशल-नरेश प्रसेनजित तथागत बुद्ध के प्रेमी थे। तथागत बुद्ध शाक्यवंशीय थे। प्रसेनजित ने सोचा कि यदि शाक्यवंशियों से अपना रक्त-सम्बन्ध जुड़ जाये तो आपसी व्यवहार ज्यादा मधुर हो जायेगा। अत: नरेश ने शाक्यों के पास दूत भेजकर अपना विवाह-प्रस्ताव रखा।

शाक्य लोग कोशल-नरेश को निम्नकोटि का क्षत्रिय मानते थे। अतः वे अपनी कन्या से उनका विवाह नहीं करना चाहते थे। परन्तु कोशल-नरेश के अ्रस्ताव को भय-वश ठुकराना भी नहीं चाहते थे; क्योंकि प्रसेनजित बलवान राजा थे। अत: शाक्यों ने अपने राजभवन की एक दासी-पुत्री को, जो सुन्दरी और दक्ष थी, शाक्य-पुत्री बताकर प्रसेनजित को व्याह दी।

उक्त दासी-पुत्री प्रसेनजित की रानी हुई। उसे विड्डभ नाम का पुत्र पैदा हुआ। वह जवान हुआ और एक बार अपने ननिहाल कपिलवस्तु गया। उसके साथ सेना थी। सेना के एक जवान को पता लगा कि विड्डभ की माता दासी- पुत्री हे। यह बात सेना में फैल गयी। विड्डभ को दासी-पुत्री की संतान समझकर शाकयों ने उससे राजोचित व्यवहार करने में भी त्रुटि की। विड्डभ को कष्ट हुआ और उसने सोचा कि पिता के मर जाने पर जब में राजा बनूंगा तब अपनी सेना से शाक्यों की सामूहिक हत्या कराऊंगा।

तथागत बुद्ध की अवस्था कोई 78 वर्ष की रही होगी। इसी बीच उनके सामने महान दुर्घटना हुई। प्रसेनजित शरीर छोड़ दिये, तब विड्डम ने समस्त शाक्यों को तलवार के घाट उतार दिया। यह परिवार का सम्पूर्ण नाश देखकर तथागत बुद्ध अवश्य दुखी हुए होंगे, परन्तु वे जीवन्मुक्त थे। वे उस अवस्था में भी भ्रमण करते हुए शांति का उपदेश देते रहे।

देवदत्त का विनाशकारी षड्य्न्त्र

बुद्धत्व-प्राप्ति के बाद जब महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु राजा सुद्धोधन को दर्शन देने गये थे, उस समय अन्य लोग तथा राजपुरुषों ने भी तथागत बुद्ध से अब्रज्या ली थी; जैसे अनुरुद्ध, आनन्द, भूगु, किबिल, देवदत्त आदि।

तथागत बुद्ध ने कपिलवस्तु में सात दिन रहकर अपने भिक्षुसंघ के सहित कौशांबी! के लिए प्रस्थान किया। रास्ते में जगह-जगह पर उनका भक्तों द्वारा सेवा-सत्कार होता था। यह सब देखकर देवदत्त के मन में हुआ कि मेरा भी ऐसा सेवा-सत्कार हो। देवदत्त धीरे-धीरे तथागत बुद्ध से ईर्ष्या करने लगा। अंततः: वह उनका साथ छोड़कर राजगृह चला गया। उस समय राजगृह के राजा “बिंबसार’ थे।

राजा बिंबसार’ का पुत्र ‘ अजातशत्रु ‘ था। देवदत्त ने अजातशत्रु से कहा कि तुम अपने पिता को मारकर राजा बनो और मैं बुद्ध को मारकर बुद्ध बनूं। देवदत्त के निरन्तर के कुसंग से अजातशत्रु अपने पिता राजा बिंबसार की हत्या कर राजगद्दी पर बैठ गया, और देवदत्त को श्रेय देकर उसे पालने लगा।

तथागत बुद्ध राजगृह में थे। एक बड़ी सभा में बैठे थे। देवदत्त ने उठकर तथागत बुद्ध का नमस्कार किया और कहा कि भगवन्‌! आप इस भिक्षु-संघ को मुझे दे दें। में इस पर शासन करूंगा । आप वृद्ध हो गये हैं। अब आप से यह चलने वाला नहीं है। तथागत बुद्ध ने उसकी बात को अस्वीकार दिया जो स्वाभाविक ही था।

एक दिन देवदत्त ने दूसरी चाल चली। उसने तथागत बुद्ध के सामने पांच शर्ते रखी–

१. भिक्षु जीवन भर जंगल में रहें; वे गांव-नगर में न जायें।

  1. भिश्षु सदैव भिक्षा मांगकर खायें; वे निमन्त्रित भोजन न करें।
  2. भिक्षु सदैव गली-कूची में पड़े चिथड़े बटोर और सिलकर पहनें; नये वस्त्र न पहनें।
  1. भिक्षु सदैव वृक्षों के नीचे निवास करें; किसी मकान, मठ आदि में न रहें।
  2. भिक्षु सदैव मछली-मांस का सेवन न करें।

तथागत बुद्ध ने कहा–देवदत्त! जो भिक्षु चाहे वह जीवनभर उपर्युक्त ढंग से रह सकता है और चाहे तो वैसा नहीं रहे। में शर्त में नहीं बांध सकता। देवदत्त ने भिक्षुसंघ में फूट डालने की प्रक्रिया शुरू कर दी और कहा
जाता है कि उसने पांच सौ भिक्षुओं को फोड़कर अपने संघ में मिला लिया।

देवदत्त ने तथागत बुद्ध की हत्या करने का कई बार प्रयास किया; परन्तु वह सफल नहीं हुआ। एक बार तथागत बुद्ध एक पर्वत पर निवास कर रहे थे। देवदत्त ने जाकर ऊपर से एक बड़ा पत्थर उनके ऊपर ढकेल दिया। संयोग से वह पत्थर उनके ऊपर न आकर बगल में गिरा, परन्तु उससे एक टुकड़ा टूटकर उनके पैर पर आ गिरा और उनके पैर में गहरी चोट लगी। काफी खून बह गया। तथागत बुद्ध महीनों में चलने-फिरने योग्य हो सके।

तथागत बुद्ध के श्रेष्ठ शिष्य सारिपुत्र के उपदेश से वे सभी भिक्षु देवदत्त के पास से तथागत बुद्ध के पास आ गये जो पहले बहककर देवदत्त के पास गये थे। इससे देवदत्त के मन को धक्का लगा।

पूरी प्रजा देवदत्त का विरोधी हो गयी। अन्ततः अजातशत्रु भी देवदत्त को सहयोग देना छोड़कर तथागत बुद्ध की सेवा करने लगा।

देवदत्त अपने पाप से पीड़ित था। वह बीमार पड़ गया। उसका रक्त कट-कट कर गिरने लगा। उसने पुनः तथागत बुद्ध की शरण में जाने की बात सोची । शिविका पर बैठकर श्रावस्ती चला। किन्तु रास्ते में एक सरोवर पर उसकी मृत्यु हो गयी।

बुद्ध और आनन्द

तथागत बुद्ध का उनकी पचपन (55) वर्ष की उम्र तक कोई स्थायी परिचारक नहीं था। कोई साधु उनकी कभी किसी प्रकार की सेवा कर देता और कोई साधु कभी किसी प्रकार। अतएव भिक्षु-संघ से तथागत ने कहा कि अब उम्र ढल रही है। मेरे साथ जो भिश्नु मेरे चीवर तथा पात्र लेकर चलता है कई बार वह रास्ते में ही चीवर-पात्र रखकर दूसरी तरफ चला जाना चाहता है। इसलिए एक स्थायी परिचारक होना चाहिए।

सारिपुत्र, मोदगल्यायन आदि अनेक भिक्षुओं ने सेवा में रहने के लिए प्रार्थना की, परन्तु अनुशास्ता ने उन्हें उस योग्य न समझकर उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। अंततः: किसी ने आनन्द से कहा कि तुम क्‍यों नहीं प्रार्थना करते? आनन्द कुछ हठीले थे, परन्तु अनुशास्ता के परम भक्‍त थे। उन्होंने कहा यदि अनुशास्ता की इच्छा होगी तो वे स्वयं मेरी सेवा लेंगे। तथागत बुद्ध ने ‘कहा-आनन्द! यदि तुम चाहो तो सेवा में रह सकते हो।

आनन्द ने सेवा करना चाहा और उन्होंने तथागत के सामने पांच शर्ते रखी- आप मुझे अच्छे वस्त्र न देंगे। आपके लिए आये किसी अच्छे भोजन में से मुझे न देंगें। आप अपने निवास-कक्ष में मुझे निवास करने का स्थान न देंगे। यदि कोई आपके दर्शनार्थ आया है, तो मैं उसे जब कभी भी आपके दर्शन करा सकूं। यदि आपने किसी को कोई उपदेश दिया है और मैं सेवा में लगे रहने के कारण नहीं सुन सका हूं, तो यदि मैं उसे सुनना चाहूं तो आप कृपया मुझे पुनः सुना दें।

आनन्द ने उक्त पांच शर्तों में प्रथम की तीन शर्तें इसलिए रखी थीं कि कोई यह न मान या कह सके कि आनन्द गुरु की सेवा अच्छे कपड़े, अच्छे भोजन तथा अच्छे निवास पाने के लिए करते हें।

तथागत बुद्ध ने उक्त सभी शर्तें बिना हिचक के स्वीकार लीं। फिर तो आनन्द उनके महानिर्वाण के समय तक सेवा में छाया की तरह लगे रहे।

जीवन के अन्तिम दिन और निर्वाण

तथागत बुद्ध का शरीर जरजर हो गया था। उनकी अवस्था 80 वर्ष की हो गयी थी। उन्होंने अपने शरीर का अंत निकट जानकर श्रेष्ठ शिष्य आनन्द से कहा कि अब यह काया जाने वाली है। आनन्द यह सुनकर विह्ल हो गये। तथागत बुद्ध ने कहा–“आनन्द! तुम व्याकुल क्यों होते हो? सारी वस्तुओं का परिवर्तन क्षण-क्षण हो रहा है। जन्म ही मृत्यु का कारण है। तृष्णा का क्षय करो और मुक्ति लो। गुरु तो केवल पथ बताने वाला है। चलना तुम्हें ही पड़ेगा। तुम स्वयं अपनी शरण हो। तुम अपनी शरण में जाओ, सत्य और धर्म का आधार लो।”

तथागत बुद्ध वैशाली से चलकर कुशीनारा के पथ में थे जो गोरखपुर के पास पड़ता है। चुंद नाम का लोहार था। तथागत बुद्ध ने उसके हाथों का भोजन खाया, जो शूकर मार्दव था। उसे खाने से तथागत को पेचिस हो गयी। उन्हें आभास हुआ कि अब शरीर नहीं रहेगा और आनन्द तथा अन्य शिष्यों से उन्होंने कहा कि कोई यह न कहना कि चुंद लोहार कलंकी या अपराधी है जिसका भोजन करने से शास्ता का अन्त हो गया, प्रत्युत यह कहना कि वह महा भाग्यशाली है जो उसका अन्तिम भोजन करके बुद्ध महानिर्वाण को प्राप्त हुए।

तथागत बुद्ध रास्ते-रास्ते जा रहे थे और कुशीनगर के वन में पहुंचे। उनकी आज्ञा से आनन्द ने दो साल वृक्षों के बीच कपड़ा बिछा दिया और उस पर वे लेट गये। सब समझ गये कि अब गुरुदेव के शरीर का अन्त है। सब व्याकुल हो उठे। उस समय हजारों भिक्षु इकट्ठे थे।

तथागत बुद्ध ने कहा–“भिक्षुओ! सब कुछ नाशवान है, अतः प्रमाद को छोड़ो, तृष्णा का क्षय करके निर्वाण प्राप्त करो।” यह थे अन्तिम वाक्य उस महा सन्त के जिसने अपने और दूसरे के हित के लिए अपने आपको साधना में त़पा डाला था और महा वैराग्यवान होकर भी जीवनपर्यन्त लोककल्याण के लिए गली-गली घूमता रहा।

तथागत बुद्ध एक महान हस्ती के व्यक्ति थे। वे जात-पांत, हिंसकी कर्मकांड तथा पाखण्ड के सर्वथा विरोधी थे। बे आर्यपुत्र थे; किन्तु आर्य- अनार्य का भेद उनके मन में नहीं था। वे मानवता के पुजारी थे।

कितने बौद्ध बन्धु तथागत बुद्ध की परम्परा को आर्यों से अलग कायम करके भेद-भाव को पुनः जाग्रत करते हैं, जो बुद्ध के उपदेश के विपरीत है। उनका तो उपदेश था मानव-मानव भाई-भाई हैं। आचरण ही से कोई छोटा- बड़ा होता है, जाति से नहीं।

तथागत बुद्ध के समकालीन

जिस समय तथागत बुद्ध ने भिक्षु वेष में होकर प्रत्रज्या ली थी देश में काफी मानसिक हलचल थी। वैदिक एवं ब्राह्मण दर्शन के अतिरिक्त कोई बासठ (62) दार्शनिक मत थे जो विलक्षण थे। उनमें छह मुख्य दर्शन ध्यान देने योग्य हैं–

पूर्णकाश्यप का अक्रियवाद

पूर्णकाश्यप कहते थे कि आत्मा पर कर्म का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। चाहे हत्या करे-करावे, चोरी करे-करावे, दान करे-करावे, इनका फल आत्मा पर कुछ नहीं। आदमी के मर जाने पर शरीर के तत्त्व अपने-अपने कारण में जा मिलते हैं, फिर कुछ नहीं।

मक्खलिगोशाल का नियतिवाद

मक्खलिगोशाल कहते थे कि जो कुछ है पूर्व से निश्चित है। न कोई कुछ कर सकता है और न करा सकता है। संसार तथा प्राणी पर जो घटनाएं घटनी हैं, घटकर रहेंगी। हम बिलकुल नियति के अधीन हैं। जैसे सूत की गोली फेंकने पर अपने आप खुलती जाती है, वैसे सब जीवों का जीवन है, पंडित और मूर्ख दौड़ते हुए आवागमन में पड़कर दुख की समाप्ति करेंगे। ये केवल भाग्यवादी थे।

अजित केशकम्बल का उच्छेदवाद

अजित केशकम्बल शायद अपना वेष कम्बल का रखते थे। वे मानते थे कि कर्म का कोई फल नहीं, यज्ञ-हवन बेकार हें। मनुष्य दुखों के तत्त्वों से बना है। मूर्ख और पंडित मरने के बाद समाप्त हो जाते हैं, आगे कुछ नहीं।

प्रक्रुध कात्यायन का नित्यपदार्थवाद

ये विचारक कहते थे कि मनुष्य सात तत्त्वों से बना है–पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सुख, दुख और आत्मा। ये सुख-दुख को भी स्वतन्त्र तत्त्व मानते थे और कहते थे कि इस संसार में न कोई मारने वाला हे, न मारा जानेवाला, न सुनने वाला, न सुनाने वाला हे। सातों तत्त्व निर्विकार हें इसलिए किसी कर्म का कोई प्रभाव नहीं। यदि कोई तलवार लेकर किसी को मारे तो कोई मरता नहीं, वह तो तलवार सातों तत्त्वों से हटकर शून्य में गिर जाती है।

संजय बेलट्टिपुत्र का अनेकान्तवाद

ये विचारक कहते थे कि यदि मुझसे कोई पूछे कि परलोक है कि नहीं, मुक्तात्मा रहता है कि नहीं, तो मैं न ऐसा कहता हूं न वैसा कहता हूं। यदि में इसको जानूं तो बताऊं। अतएव मैं ऐसा-वैसा कुछ नहीं कहता।

वर्धमान महावीर का सर्बज्ञताबाद

ये जैनधर्म के अन्तिम चौबीसवें तीर्थंकर हैं। ये तथागत बुद्ध से ज्येष्ठ थे और वैशाली (बिहार) में जन्में थे। ये राजपुत्र थे। इन्होंने तीस वर्ष की उम्र में बैराग्य धारण किया। ये अनेक आत्मा मानते थे और संयम से कर्मक्षय होकर मोक्ष मानते थे और मुक्तात्मा सर्वज्ञ हो जाता हे, यह इनकी धारणा थी।

एक बार इन छहों (उक्त दार्शनिकों) तथा तथागत बुद्ध का राजगृह में एक साथ वर्षा में चौमासा निवास हुआ था। ये छहों दार्शनिक बुद्ध से उम्र में बड़े थे।

तथागत बुद्ध के वर्षावास

महात्मा बुद्ध का जन्म लुम्बनी में ईसा पूर्व 563 में हुआ तथा गया में ईसा पूर्व 528 में वे बुद्धत्व प्राप्त किये और बुद्धत्व प्राप्ति के बाद वे तीन महीने वर्षा को छोड़कर सदैव विचरण करते हुए उपदेश देते रहे। इस बीच में वर्षा निम्न स्थलों पर बिताये–

स्थानईसा पूर्व
ऋषिपत्तन ( सारनाथ-वाराणसी )528
राजगृह527-525
वैशाली524
मंकुल पर्वत (बिहार)523
त्रयसि (त्रयसिश? )522
संसुमारगिर (चुनार)521
कौशाम्बी (इलाहाबाद)520
पारिलेयक (मिर्जापुर)519
नाला (बिहार)518
वबैरंजा (कन्नौज-मथुरा के बीच) 517
चालिय पर्वत (बिहार)516
श्रावस्ती (गोंडा)515
कपिलवस्तु514
आलवी (अखल)513
राजगृह512
चालिय पर्वत511
चालिय पर्वत510
राजगृह 509
श्रावस्ती (गोण्डा)508-484
वैशाली483

कुशीनारा (गोरखपुर) में निर्वाण 483


उक्त विवरण से ज्ञात होता है कि अन्य जगह 1-7 वर्षा, 5 वर्षा राजगृह, 2 वर्षा वैशाली, 3 वर्षा चालिय पर्वत और श्रावस्ती (गोण्डा) में 26 वर्षा व्यतीत किये। इस प्रकार तथागत बुद्ध अपना पूरा जीवन उत्तर प्रदेश तथा बिहार में ही व्यतीत किये, इसके बाहर वे कभी नहीं गये।

बुद्ध दर्शन- आर्यसत्य

तथागत बुद्ध ने चार आर्य सत्य माना है। आर्यसत्य अर्थात श्रेष्ठ-सत्य। वे हैं–दुख आर्यसत्य, दुख समुदाय आर्यसत्य, दुखनिरोध आर्यसत्य तथा दुख निरोध की ओर ले जाने वाला आर्यसत्य।

दुख आर्यसत्य –

जन्म, जरा, रोग, प्रियवियोग, अप्रिय-संयोग, मृत्यु आदि प्रत्यक्ष दुख हैं। वस्तुत; जीवन धारण ही दुख है। यह दुख ऐसा है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।

दुख समुदय आर्यसत्य –

दुख जिससे उदय होता है वह कारण भी है। दुख के बारह कारण या श्रृंखलाएं हैं, वे इस प्रकार हैं–

1-अविद्या — तत्वज्ञान हीनता 2-संस्कार–पूर्व जन्म या इस जन्म की शुभाशुभ वासनाएं।
3-विज्ञान–चैतन्यता, संसार का भान होना।
4-नाम-रूप–मन और शरीर की अवस्थाएं।
5-घडायतन–आंख , नाक, कान, जीभ, चमड़ी और मन।
6-स्पर्श–विषयों का भोग। 7-वेदना–सुख, दुख तथा उदासीनता का अनुभव। 8-तृष्णा–अधिक-अधिक लालसा। 9-उपादान–आसक्ति। 10-भव–जन्म। 11-जरा–बुढ़ापा 12-मरण–प्राणान्त |

दुःख निरोध आर्यसत्य

अर्थात यह भी श्रेष्ठ सत्य है कि दुखों का निरोध एवं नाश होता हे।

दुख निरोध की ओर ले जाने वाला आर्यसत्य

यह भी श्रेष्ठ सत्य है कि दुखों के निरोध के साधन या पथ हैं। दुखनिरोध के आठ क्रमिक मार्ग हैं, जो
आर्य अष्टांगिक मार्ग भी कहलाते हैं–

सम्यकदृष्टि–पूर्णज्ञान। सम्यक संकल्प–अपने और दूसरे के कल्याण के लिए पक्का निश्चय। सम्यक वचन–असत्य, कट, चुगुली तथा परनिंदा से दूर रहना। सम्यक कर्मान्त–बुरे कर्मों का त्याग करके पवित्र कर्म करना। सम्यक आजीव–जीवन निर्वाह का पवित्र धन्धा। सम्यक व्यायाम–उचित पुरुषार्थ । सम्यक स्मृति–पूर्ण विचार। सम्यक समाधि–मन का पूर्ण शांत होना।

संक्षेप में कहें तो बौद्धदर्शन इतने में है–

1- गैर प्रत्यीत्यसमुत्पाद–प्रत्यीत्य = इसके होने से, समुत्पाद = यह होता है। जैसे दुख के बारह कारण ऊपर दिये गये हें वे क्रमिक है। पहले वाले के होने से दूसरे वाले होते हैं।

2-बन्धन–अविद्या, कर्म और तृष्णा।

3-निवृत्ति–प्रज्ञा, शील और समाधि।

FAQ- गौतम बुद्ध

S.NO.प्रश्नउत्तर
1गौतम बुद्ध की मौत कैसे हुई?महात्मा बुद्ध ने 483 ईसा पूर्व 80 वर्ष की आयु में अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया, और परमात्मा में विलीन हो गए।
2बुद्ध भगवान का क्या नाम था?गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था I
3बौद्ध धर्म से पहले कौन सा धर्म था?यह धर्म कभी ईरान का राजधर्म हुआ करता था । हालांकि इतिहासकारों का मत है कि जरथुस्त्र 1700-1500 ईपू के बीच हुए थे । कहा जाता है कि ईसाई और इस्लाम धर्म से पूर्व बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई थी ।
4गौतम बुद्ध के कितने बेटे थे? गौतम बुद्ध का एक पुत्र था जिनका नाम था राहुल।
5गौतम बुद्ध के कितने नाम है?पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि इनमें बुद्ध के तीन नाम अति प्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।
6महात्मा बुद्ध की मृत्यु कहाँ हुई?
महात्मा बुद्ध की मृत्यु कुशीनगर में हुई I
7गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति कब हुई?वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही भगवान बुद्ध का जन्म हुआ, इसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ।
8बौद्ध धर्म की पवित्र पुस्तक कौन सी है?त्रिपिटक (पाली:तिपिटक; तीन पिटारी) बौद्ध धर्म का प्रमुख ग्रंथ है I
9बौद्ध धर्म की कितनी शाखाएं हैं?बौद्ध धर्म की प्रमुख रूप से दो शाखाएँ हैं – थेरवाद और महायान।
10बौद्ध धर्म का मूल मंत्र क्या है?प्रेम, करुणा, आपसी भाईचारा बौद्ध धर्म का मूल मंत्र है।


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मै उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले से हूँ , मैंने M.B.A. (Marketing) काशी से किया है , मैंने मुख्य रूप से फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री और इन्सोरेन्स सेक्टर में काम किया है , लिखना और महान लोगों के बारे में पढना मेरा मुख्य शौक है , मै बास्केटबाल का प्रदेश स्तर का खिलाडी भी रह चुका हूँ

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