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दीपावली पर निबंध | Essay on Deepawali in Hindi

दीपावली पर निबंध | Essay on Deepawali in Hindi

दीपावली-उल्लास व प्रकाश का उत्सव

दीपावली प्रकाश का अन्यतम पर्व है।’तमसो मा ज्योतिर्गमय ‘ का महान्‌ उत्सव हैI मन को आलोकित करने का त्यौहार है। धन, सम्पत्ति, सौभाग्य एवं सत्त्वगुण की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी के पूजन का दिवस है। जन-मन की प्रसन्नता, हर्षोल्लास एवं श्री-सम्पन्नता की कामना का महापर्व है। अनेक महान्‌ तथा पूज्य पुरुषों के जीवन से सम्बद्ध प्रेरणाप्रद घटनाओं का स्मृति पर्व है।

दीपावली

कार्तिक की अमावस्या दीपावली का शुभ दिन है । अमावस्या की काली रात को हिन्दू-जनता, घर-घर में दीपकों की पंक्ति जलाकर उसे पूर्णिमा से अधिक उजियाला बना देती है।यह उजियाला न केवल वातावरंण को उज्ज्वल करता है, अपितु मन के अंधकार को हटाकर उसे ज्योतिर्गमय करने का संदेश भी देता है।

दीपावली -पर्वों का समूह

दीपावली एक दिवसीय पर्व नहीं, यह पर्व समूह है जो कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की दूज तक बड़े हर्षोल्लास से समारोहपूर्वक सम्पन्न होता है । ये उत्सव हैं धन-त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा (अनकूट) तथा भातृद्वितीया (भैयादूज) दीपावली आदिकाल में आर्यों की आर्थिक सम्पननता एवं हर्षोल्लास का पर्व रहा होगा।

आर्थिक सम्पन्नता का मापदंड था कृषि उपज। फसल के घर आने को स्वर्ण -भरण माना गया होगा। वर्ष-भर के कड़े श्रम के बाद घर आई ‘ अन्न-धन’ रूपी लक्ष्मी का स्वागत करने के लिए घर-आँगन लीप-पोत कर साफ-सुथरे किए जाते रहे होंगे और अभावों के कूड़े-करकट को झाड़-बुहार का एक किनारे फेंक दिया जाता रहा होगा। प्रत्येक घर में नए कपास की बाती से, ‘नए तिल के तेल में दीप संजोया जाता रहा होगा और नए वर्ष की अगवानी की जाती रही होगी।

इसीलिए दीपावली से एक मास पूर्व घर की सफाई, लिपाई-पुताई तथा दीप-प्रज्वलन की परम्परा प्राचीन काल की देन है। समुद्र-मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी भी एक रत्न थी। इस लक्ष्मी रत का प्रादुर्भाव कार्तिक की अमावस्या को हुआ था। उस दिन से कार्तिक की अमावस्या लक्ष्मी-पूजन का पर्व बना। इस अवसर पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश-पूजन का भी विधान है।

लक्ष्मी जी धन-सम्पत्ति कौ अधिष्ठात्री देवी हैं और गणेश जी विध्रनाशक तथा मंगल के देवता हैं । लक्ष्मी-गणेश के समन्वित पूजन का अर्थ है–धन का मंगलमय संचयन और उसका धर्म सम्मत उपभोग। अन्यथा धन-सम्पत्ति पाप एवं जीवन में विघ्नों की उपस्थिति का कारण बन जाएगी।

लक्ष्मी श्रम-साध्य है ।कृषि संस्कृति का मूल-मंत्र ही श्रम है। धर्म पुंर आधारित लक्ष्मी का पूजन श्रम-बिन्दुओं से होता है। गणपति इस श्रम को मंगलकारी घनाते हैं। इसलिए धर्म पर आधारित अर्थ (लक्ष्मी) कमलासना है और अधर्म पर आधारित लक्ष्मी उलूकवाहिनी। अत: लक्ष्मी के साथ गणपति का पूजन होता है।

एककिंवदन्ती यह भी है कि भारतीय-संस्कृति के आदर्श पुरुष श्रीराम लंकेश्वर रावण पर विजय प्राप्त कर भगवती सीता सहित जब अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत के लिए घरों को सजाया और रात्रि को दीपमालिका की । श्रीराम के अयोध्या लौटने के प्रसंग को ‘दीपावली ‘ से सम्बद्ध कर दिया गया है। (पर यह भी जनश्रुति मात्र ही है,तथ्य नहीं)

दीपावली -महापुरुषों के जीवन से संबंधित घटनाएँ

दीपावली के पावन दिन से अन्य अनेक महापुरुषों के जीवन की घटनाओं का भी सम्बन्ध है। महाराज युधिप्ठिर का गजसूय-यज्ञ इसी दिन सम्पन्न हुआ था।

राजा विक्रमादित्य आज के ही दिन सिंहासन पर बैठे थे। जैन धर्म के अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी, आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे का स्वगगरोहण दिवस भी है । वेदान्त के प्रसिद्ध विद्वान स्वामी रामतीर्थ का जन्म, ज्ञान प्राप्ति तथा निर्वाण, तीनों इसी दिन हुए थे। सिवखों के छठे गुरु हरगोविन्द जी ने इसी दिन कारावास से मुक्ति पाई थी।

भले ही ये घटनाएँ कार्तिक अमावस्या को हुई थीं, पर “दीपावली ‘ का उत्सव तो समाज हजारों वर्षों से मनाता आ रहा है। अत: डस उत्सव से उनका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं।

दीपावली का वैज्ञानिक महत्त्व

दीपावली का वैज्ञानिक महत्त्व भी है। दीपावली से पूर्व वर्षा ऋतु समाप्त हो जाती है, किन्तु घरों में मच्छरों, खटमलों, पिस्सुओं और अन्यान्य विपैले कीटाणुओं की भरमार छोड़ जाती है। मलेरिया व टाइफाइड के फलने-फूलने के दिन होते हैं।

दूसरे, वर्षभर की गन्दगी से घर की अस्वच्छता पराकाप्ठा पर होती है। अतः दीपावली से महीने-भर पहले ही गरीब और अमीर, सभी अपनी-अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार घरों को सफाई, लिपाई-पुताई और सजावट करते हैं । इससे घर कौ गन्दगी दूर हो जाती है। नीले थोथे के मिश्रण से की गई सफेदी से मच्छर मर जाते हैं । सरसों के तेल के दोपक जलाने से रोगादि के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। सरसों के तेल का धुआँ (काजल) आँखों के लिए अत्यन्त लाभप्रद है।

दीपावली के दिन घरों, दुकानों, मंडियों तथा बाजारों को खूब सजाया जाता है । रात्रि को प्रज्वलित किये जाने वाले नन्‍हें दीपों के प्रकाश से अमावस का गहनतम नप्ट हो जाता है। विद्युत्‌ के प्रकाश से सर्वत्र चकाचौंध भर जाती है। पुष्पमालाओं, पन्‍ने-पत्तियों को झिलमिल लड़ियों, कागज की रंगीन- अद्भुत लहरियों तथा कलात्मक झंडियों से यह शोभा द्विगुणित हो जाती है।

रात्रि के प्रथम प्रहर से अर्धरात्रितक आतिश+।जी का दौर, इस पर्व के उल्लास–उत्साह तथा परम-हर्ष को प्रकट करता है । आतिशबाजी की अग्नि से विभिन प्रकार की रंग-बिरंगी आकर्षक झड़ियाँ हृदय को विभोर कर देती हैं। बच्चों के हाथों से जलती फुलझड़ियाँ, पटाखों की लड़ियों को पट-पट की कर्ण-भेदी आवाज. अनार और बमों से निकलती स्वर्णिम चिंगारियाँ, गगन को छूती और गनन में फूटती हवाइयों की विचित्र अग्नि-रश्मियाँ दर्शकों के मन में अद्भुत उत्साह, प्रेरणा और खुशियाँ भर देती हैं।

दीपावली -घरों की सजावट व खरीददारी का दिन

दीपावली खरीददारी की उमंग का दिन है । मिट्टी के खिलौनों तथा दीवे, मोमबत्तियाँ, तस्वीरें-कलेण्डर, दीपावली -शुभकामनाएँ और पूजा-सज्जा के लिए उपकरण के समान, मिठाई, सूखे-मेवे तथा फल, पुष्प, पुष्पमालाओं, आतिशवाजी के ममान आदि की दुकानों पर अपार भीड़ होती है । ग्राहक जितने अधीर हैं, दुकानदार भी विधुत यन्त्र की भाँति उतनी ही त्वरा से विक्रेय वस्तु देने को तत्पर हैं।

दीपावली पारिवारिक-मंगल-कामना के विस्तार का पर्व है। इस दिन बंधु-बांधवों तथा मित्रों को बधाई देना तथा उपहार भेजना मंगल-कामना के विस्तार का प्रतीक और सुसंस्कृत रूप है।

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Updates On Deepawali

Frequently Asked Question (FAQs)- दीपावली पर निबंध | Essay on Deepawali in Hindi

प्रश्न 1– दिवाली कब है?/2021 में दीपावली कब है?/दीपावली कितनी तारीख को है?When is Diwali in 2021?

उत्तर- दिवाली / दीपावली 2021 में 4 नवंबर, 2021, गुरुवार को है I

दिवाली लक्ष्मी पूजा मुहूर्त:  4 नवंबर, 2021, गुरुवार को शाम 06 बजकर 09 मिनट से रात्रि 08 बजकर 20 मिनट

प्रश्न 2- 2021में धनतेरस का शुभ मुहूर्त कब है?

उत्तर-धनतेरस 2 नवंबर ,2021, मंगलवार को है I धनतेरस शुभ मुहूर्त :18:18:22 से 20:11:20 तक


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