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स्वामी दयानंद सरस्वती पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण । 600-700 Words Essay speech on Swami Dayanand Saraswati in Hindi

स्वामी दयानंद सरस्वती पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण – 600-700 Words Essay speech on Swami Dayanand Saraswati in Hindi

स्वामी दयानंद सरस्वती से जुड़े छोटे निबंध जैसे स्वामी दयानंद सरस्वती पर  600-700 शब्दों में  निबंध,भाषण  स्कूल में कक्षा 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11,और 12 में  पूछे जाते है। इसलिए आज हम  600-700 Words Essay speech on Swami Dayanand Saraswati in Hindi के बारे में बात करेंगे ।

600-700 Words Essay, speech on Swami Dayanand Saraswati in Hindi for Class 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 & 12

जब-जब धर्म की हानि होती है और पृथ्वी पर पाप बढ़ जाता है, तब-तब धरती पर अनेक भक्त, संत तथा समाज सुधारक अवतरित होते रहते हैं। उनमें से महर्षि दयानंद सरस्वती एक थे। वे हिंदू धर्म के महान समाज सुधारक तथा आर्य संस्कृति के रक्षक थे। वे आधुनिक भारत के ऋषि थे, लेकिन प्राचीन ऋषि-मुनियों की भांति जीवन यापन करते थे। आप बहुत बड़े विद्वान थे। आपने आर्य समाज की स्थापना करके देश का महान कल्याण किया। महर्षि दयानंद ने जनता को अनुद्योग, आलस्य तथा अकर्मण्यता के स्थान पर उद्योग, परिश्रम और कर्मण्यता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने जाति वैषम्यता, अस्पृश्यता और भेदभाव को दूर किया। वे आडंबर तथा अंधविश्वासों के घोर विरोधी थे।

महर्षि दयानंद का प्रादुर्भाव 1824 में गुजरात प्रांत के टंकारा नामक गांव में हुआ था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। आपके पिता श्री अंबाशंकर शिव जी के सच्चे उपासक थे। आपके पिता गांव के बड़े जमींदार थे तथा आपका परिवार संपन्न था। आपकी शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई थी। सनातन धर्म की पद्धति के अनुसार मूलशंकर का पांच वर्ष की अवस्था में यज्ञोपवीत संस्कार तथा विद्यारंभ संस्कार कराया गया। कुशाग्र बुद्धि होने के कारण 12 वर्ष की अवस्था में ही आपको संस्कृत का यथेष्ट ज्ञान हो गया था।

बालक मूलशंकर की आयु लगभग 13 वर्ष की थी, तभी शिवरात्रि का महान पर्व आया। पिता के आग्रह पर मूलशंकर ने व्रत रखा, संध्या हुई और शिव मंदिर शिव भक्तों से भर गया। वेद-मंत्रों द्वारा शिव जी का पूजन किया गया। बालक मूलशंकर भगवान शिव के दर्शनों की लालसा में सारी रात जागता रहा। अर्द्ध रात्रि के समय उन्होंने देखा कि वहां एक चूहा आया और शिवलिंग पर चढ़कर बैठ गया। वह कभी चढ़ता और कभी उतरता तथा वहां रखे भोग को खाता। बालक मूलशंकर विचित्र विस्मय में पड़ गया। वह सोचने लगा कि शिव तो अत्यंत शक्तिशाली हैं। सारे विश्व का सृजन और संहार करते हैं। फिर वे चूहों से अपनी रक्षा क्यों नहीं करते? तभी उनकी विचारधारा बदल गई। उनके विश्वासों का महल ढह गया। वे श्री शिव की खोज में निकल पड़े ।

एक दिन मूलशंकर की बहन और चाचा की मृत्यु हो गई। इस घटना उनके मन को दुखी कर दिया। विरक्ति की भावना तीव्र हो गई। 21 वर्ष की अवस्था में विवाह के दिन घर-बार त्याग कर आप वन में चले गए और संन्यासी बन गए। तब से वे स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुए। संन्यासी बन जाने पर भी आप आत्मा और परमात्मा के रहस्य न जान सके। दयानंद जी ने योगियों-महात्माओं के मठ के चक्कर लगाए, परंतु उनके

मन को शांति नहीं प्राप्त हुई। वे अनेक वर्षों तक तीर्थाटन ही करते रहे। अंत में आपकी भेंट मथुरा में स्वामी विरजानंद जी से हुई। स्वामी जी नेत्रों से अंधे थे, फिर भी उन्हें वेद, व्याकरण, ज्ञान और वैराग्य की शिक्षा देने लगे। स्वामी विरजानंद के चरणों में रहकर आपकी ज्ञान पिपासा शांत हुई। उनके हृदय की उलझी हुई गुत्थियां सुलझ गईं। शिक्षा समाप्ति के बाद गुरु बोले, “दयानंद, मेरी गुरु दक्षिणा यही है कि तुम देश-विदेश में जाकर वेदों के ज्ञान का प्रचार करो।” गुरु जी से आशीर्वाद प्राप्त करके दयानंद जी संन्यासी धर्म के प्रचार के लिए निकल पड़े। उन्होंने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। वे जहां भी जाते, पंडितों से शास्त्रार्थ करते और उन्हें अपने विचारों से प्रभावित करते।

सर्वप्रथम हरिद्वार में कुंभ मेले में पहुंचकर उन्होंने ‘पाखंड-खंडिनी पताका’ फहरा दी। उन्होंने काशी में दो बार शास्त्रार्थ किया तथा सनातन धर्म के विद्वानों के मंडल को परास्त किया। वे पाखंड, मूर्ति पूजा, दहेज, बाल-विवाह, जात पांत और छुआछूत के विरुद्ध स्थान-स्थान पर भाषण देने लगे। आपने लोगों को समझाया कि ईश्वर एक और निराकार है। ईश्वर की कोई मूर्ति या आकार नहीं है। अतः लोगों को मूर्ति पूजा नहीं करनी चाहिए। उन्होंने वेदों के सच्चे ज्ञान का प्रचार किया बहु-विवाह, विधवा-विवाह और अनमेल विवाह का भयंकर विरोध किया तथा हजारों हिंदुओं को धर्म परिवर्तन से बचाया।

स्वामी दयानंद ने अपने विचारों को ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा। उन्होंने भारतवासियों को उपदेश दिया कि यदि वे धर्म के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहते हैं, तो वेदों का अध्ययन करें। उन्होंने ब्रह्मचर्य पर बल दिया तथा उसके महत्व और मर्म से परिचित कराया। इनका निधन 30 अक्टूबर, 1883 को हुआ। स्वामी जी ने अपने जीवन काल में अनेक ग्रंथों की रचना की थी, जिनमें ‘सत्यार्थ प्रकाश’ विशेष रूप से प्रसिद्ध है। आपके प्रयासों से ही नारियों को समाज में सम्माननीय स्थान मिला। आपकी कृपा से ही सारे देश में गुरुकुल, में डी.ए.वी. विद्यालय एवं कॉलेज स्थापित हैं। भारत सदैव इनका ऋणी रहेगा।

600-700 Words Essay speech on Swami Dayanand Saraswati

महर्षि दयानंद सरस्वती के विचार -: Swami Dayanand Saraswati Quotes In Hindi

वेदों की ओर लौटो।

लोभ कभी समाप्त न होने वाला रोग है।

आत्मा एक है, लेकिन उसके अस्तित्व अनेक हैं।

जीभ से वही निकलना चाहिए जो अपने हृदय में हैं।

अज्ञानी होना गलत नहीं है। अज्ञानी बने रहना गलत है।

मनुष्य को दिया गया सबसे बड़ा संगीत वाद्य, उसकी आवाज है।

मानव जीवन में लोगों के दुखों का मूल कारण ‘तृष्णा’ और ‘लालसा’ होती है।

कोई भी मूल्य तब मूल्यवान है जब उस मूल्य का मूल्य किसी के लिए मूल्यवान हो।

पूरी तरह से अंधविश्वासी होने के बजाय वर्तमान जीवन में कर्म अधिक महत्वपूर्ण हैं।

दुनिया को आप अपना सर्वश्रेष्ठ दीजिए, आपके पास भी सर्वश्रेष्ठ ही लौट कर आएगा।

आर्य समाज की स्थापना करने का मुख्य उद्देश्य संसार के लोगों का उपकार करना है।

लोग कहते हैं कि वे समझते हैं कि मैं क्या कहता हूं और मैं सरल हूं। मैं सरल नहीं हूँ, मैं स्पष्ट हूं।

सेवा का उच्चतम रूप एक ऐसे व्यक्ति की मदद करना है, जो बदले में धन्यवाद देने में असमर्थ है।

मनुष्य की विद्या उसका अस्त्र, धर्म उसका रथ, सत्य उसका सारथी और भक्ति रथ के घोङे होते हैं।

गीत व्यक्ति के मर्म का आह्वान करने में मदद करता है। और बिना गीत के, मर्म को छूना मुश्किल है।

वेद सभी सत्य विधाओं की किताब है, वेदों को पढना-पढाना, सुनना-सुनाना सभी आर्यों का परम धर्म है।

लालच वह अवगुण होता है, जो प्रत्येक दिन बढ़ता ही जाता है । जब तक इंसान का पतन नहीं हो जाता है।

अहंकार इंसान की वह स्थिति है, जिसमें वह अपने मूल कर्तव्यों को भूलकर विनाश की ओर चला जाता है।

सबसे श्रेष्ठ किस्म की सेवा ऐसे व्यक्ति की मदद करना है जो बदले में आपको धन्यवाद कहने में भी असमर्थ हो।

एक इंसान को अपने नश्वर शरीर के बजाय ईश्वर से प्रेम करना चाहिए और सत्य और धर्म से प्यार करना चाहिए।

अगर आप पर हमेशा ऊँगली उठाई जाती रहे तो आप भावनात्मक रूप से अधिक समय तक खड़े नहीं हो सकते।

लाभ बुराइयों को दूर करता है, सदाचार की प्रथा को पेश करता है, और समाज कल्याण और सभ्यता को जोड़ता है।

लोगों को कभी भी चित्रों की पूजा नहीं करनी चाहिए। मानसिक अंधकार का प्रसार मूर्तिपूजा के प्रचलन के कारण है।

हमें पता होना चाहिए कि भाग्य भी कमाया जाता है थोपा नहीं जा सकता। और ऐसी कोई कृपा नहीं है जो कमाई ना जा सके।

लोगों को कभी भी तस्वीरों की पूजा पाठ नही करनी चाहिए, मानसिक अन्धकार का फैलाव मूर्ति पूजा के प्रचलन की वजह से है।

मोक्ष पीड़ा सहने और जन्म – मृत्यु की अधीनता से मुक्ति है, और यह भगवान की अपारता में स्वतंत्रता और प्रसन्नता का जीवन है।

जो व्यक्ति सबसे कम ग्रहण करता है और सबसे अधिक योगदान देता है वह परिपक्व है, क्योंकि देने में ही आत्म-विकास निहित है।

उपकार बुराइयों को दूर करता है, सदाचार की आदत को प्रारंभ करता है, और समाज कल्याण और सभ्यता को संपादित करता है।

नुकसान से निपटने में सबसे जरूरी चीज है, उससे मिलने वाली सीख को कभी ना भूलना। यही चीज आपको सही मायने में विजेता बनाएगी।

ईश्वर का न तो रूप है और न ही रंग। वह दिव्य और अपार है। दुनिया में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह उसकी महानता का वर्णन करता है।

इंसान के आचरण की नींव संस्कार होती है, जितना गहरा इंसान का संस्कार होगा। उतना ही मजबूत उसका कर्तव्य ,धर्म ,सत्य और न्याय होगा।

किसी भी रूप में प्रार्थना प्रभावी है क्योंकि यह एक क्रिया है। इसलिए इसका परिणाम होगा। यह इस ब्रह्मांड का नियम है जिसमें हम खुद को पाते हैं।

वो अच्छा और बुद्धिमान है जो हमेशा सच बोलता है, पुण्य के कामों पर काम करता है, और दूसरों को अच्छा और खुश करने की कोशिश करता है।

इंसान को किसी से भी ईर्ष्या नही करनी चाहिए, क्योंकि ईर्ष्या इंसान को अंदर ही अंदर जलाती रहती है, और पथ से भटकाकर पथ को भ्रष्ट कर देती है।

आप दूसरों को बदलना चाहते हैं ताकि आप आजाद हो सकें। लेकिन यह कभी उस तरह से काम नहीं करता है। दूसरों को स्वीकार करें और आप स्वतंत्र हैं।

जो ताकतवर होकर कमजोर लोगों की मदद करता है, वही वास्तविक मनुष्य कहलाता है, ताकत के अहंकार में कमजोर का शोषण करने वाला तो पशु की श्रेणी में आता है।

किसी भी कार्य को करने से पहले सोचना अक्लमंदी होती है और काम को करते हुए सोचना सावधानी कहलाती है, लेकिन काम को करने के बाद सोचना मूर्खता कहलाती है।

कोई भी मानव हृदय सहानुभूति से वंचित नहीं है। कोई धर्म उसे सिखा-पढ़ा कर नष्ट नहीं कर सकता। कोई संस्कृति, कोई राष्ट्र, कोई राष्ट्रवाद – कोई भी उसे छू नहीं सकता। क्योंकि ये सहानुभूति है।

जब एक इंसान अपने क्रोध पर विजय हासिल कर लेता है, अपने काम को काबू में कर लेता है, यश की इच्छा को त्याग देता है, मोह माया से दूर चला जाता है। तब उसके अंदर अदभुत शक्तियां आ जाती हैं।

मुझे सत्य का पालन करना पसंद है। बल्कि, मैंने औरों को उनके अपने भले के लिए सत्य से प्रेम करने और मिथ्या को त्यागने के लिए राजी करने को अपना कर्त्तव्य बना लिया है। अतः अधर्म का अंत मेरे जीवन का उदेश्य है।

जीवन में मृत्यु को टाला नहीं जा सकता। हर कोई ये जानता है, फिर भी अधिकतर लोग अन्दर से इसे नहीं मानते – ‘ये मेरे साथ नहीं होगा’। इसी कारण से मृत्यु सबसे कठिन चुनौती है जिसका मनुष्य को सामना करना पड़ता है।

ईश्वर पूर्ण रूप से पवित्र और बुद्धिमान है। उसकी प्रकृति, गुण और शक्तियां सभी पवित्र हैं। वह सर्वव्यापी, निराकार, अजन्मा, अपार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, दयालु और न्याययुक्त है। वह दुनिया का रचनाकार, रक्षक और संघारक है।

छात्र की योग्यता ज्ञान अर्जित करने के प्रति उसके प्रेम, निर्देश पाने की उसकी इच्छा, ज्ञानी और अच्छे व्यक्तियों के प्रति सम्मान, गुरु की सेवा और उनके आदेशों का पालन करने में दिखती है। क्योंकि मनुष्यों के भीतर संवेदना है, इसलिए अगर वो उन तक नहीं पहुँचता जिन्हें देखभाल की ज़रुरत है तो वो प्राकृतिक व्यवस्था का उल्लंघन करता है।

महर्षि दयानंद सरस्वती के विचार -: Swami Dayanand Saraswati Quotes In Hindi

FAQ

स्वामी दयानंद सरस्वती के गुरु का क्या नाम था?

स्वामी विरजानन्द

स्वामी दयानंद सरस्वती ने किसकी स्थापना की थी?

दयानंद सरस्वती ने 1875 में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की थी.

स्वामी दयानंद के बचपन का नाम क्या था?

स्वामी दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर था। मूल नक्षत्र में पैदा होने और भगवान शिव में गहरी आस्था रखने के कारण इनके माता-पिता ने इनका नाम मूलशंकर था।

स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज की स्थापना कब की?

10 अप्रैल 1875 को उन्होंने मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की।

घर का त्याग करते समय मूल शंकर की आयु कितने वर्ष की थी?

इक्कीस वर्ष

दयानंद सरस्वती की मृत्यु कब हुई?

30 अक्टूबर1883

दयानंद की मृत्यु कैसे हुई?

स्वामी जी के समझाने पर महारज जसवन्त सिंह ने वेश्या से नाता तोड़ लिया। क्रोधित होकर वेश्या ने रसोई बनाने वाले से मिलकर स्वामी जी को दूध में जहर मिलाकर पिला दिया। इससे स्वामी दयानंद सरस्वती जी बीमार हो गए और 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन उनकी मृत्यु हो गयी।

स्वामी दयानंद ने विरजानंद से कितने वर्ष विद्या ग्रहण की?

उन्होंने लगभग 3 वर्ष गुरु चरणों में बैठकर संस्कृत की अष्टाध्यायी-महाभाष्य प़द्धति सहित निरुक्त व निघण्टु के विषयों का अभ्यास किया।

स्वामी दयानंद के पिता का नाम क्या था?

करशनजी लालजी तिवारी

दयानंद सरस्वती कौन सी जाति के थे?

ब्राह्मण

सुप्रसिद्ध ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश के रचयिता कौन थे?

दयानंद सरस्वती

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