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सरदार वल्लभभाई पटेल  पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण । 600-700 Words Essay speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi

सरदार वल्लभभाई पटेल  पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण – 600-700 Words Essay speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi

सरदार वल्लभभाई पटेल  से जुड़े छोटे निबंध जैसे सरदार वल्लभभाई पटेल  पर  600-700 शब्दों में  निबंध,भाषण  स्कूल में कक्षा 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11,और 12 में  पूछे जाते है। इसलिए आज हम  600-700 Words Essay speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi के बारे में बात करेंगे ।

Table of Contents

600-700 Words Essay, speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi for Class 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 & 12

सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम लेते ही हमारे सम्मुख एक ऐसे व्यक्ति का चित्र उभर जाता है, जो न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम का रा नायक था, वरन जिसने स्वतंत्र भारत को एक सूत्र में संगठित करके समूचे विश्व को चकित कर दिया। सन 1947 में अंग्रेजों को भारत से जाने के लिए बाध्य होना पड़ा, परंतु वे यहां 534 देशी रियासतों को आजाद बने रहने की ऐसी छूट दे गए, जिसके कारण देश टुकड़ों में विभाजित हो सकता था।

सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1857 को गुजरात के खेड़ा जिले के करमसद गांव के ऐसे परिवार में हुआ था, जो अपनी देश भक्ति के लिए प्रसिद्ध था। उनके पिता श्री झबेरभाई 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी की सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों से लोहा ले चुके थे। वल्लभभाई पटेल उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। परंतु आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण उन्हें मैट्रिक के पश्चात ही मुख्तारी की परीक्षा पास कर आजीविका कमाने में लगना पड़ा। लेकिन उन्होंने अपना इरादा नहीं छोड़ा। कुछ धन अर्जित करके वे सन 1910 में विदेश गए और वहां से सन 1913 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे।

महात्मा गांधी की प्रेरणा से बारदोली के किसानों को संगठित करके वल्लभभाई पटेल ने देश में जागरण की नई ज्योति जगाई। अपनी चमकती हुई वकालत को छोड़कर वे राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े और त्यागी जीवन का एक नया आदर्श लोगों के समक्ष रखा। बारदोली की सफलता और पटेल की संगठन शैली से महात्मा गांधी काफी प्रभावित थे। इसीलिए गांधी जी ने उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की। किसानों की दशा सुधारने और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलनों से जोड़ने के लिए, जो काम सरदार पटेल ने किया, वह अद्वितीय है। भारतीय देशी राज्यों को भारतीय संघ में मिलाकर वे ‘लौह पुरुष’ कहलाए।

सरदार पटेल फौजदारी के एक प्रसिद्ध वकील थे, परंतु देश सेवा की राह अपनाकर उन्होंने 1916 से 1945 तक सभी सक्रिय आंदोलनों में भाग लिया। खेड़ा सत्याग्रह, बारदोली आंदोलन, डांडी यात्रा, सविनय अवज्ञा आंदोलन, व्यक्तिगत सत्याग्रह तथा भारत छोड़ो आंदोलन में वे अग्रिम पंक्ति में थे।

सरदार पटेल अत्यंत स्पष्टवादी व्यक्ति थे। उनके स्वभाव में असाधारण दृढ़ता थी। उन्हें कोई विचलित नहीं कर सकता था। वे जो निश्चय कर लेते उसे पूरा करके छोड़ते थे। कश्मीर में मुहाजिदों से टक्कर हो या हैदराबाद के रजाकारों से मुकाबला – सभी में वे स्वराष्ट्र मंत्री रूप में अडिग निर्णय लेते थे। यदि नेहरू जी ने हठधर्मिता न दिखाई होती, तो आज संपूर्ण कश्मीर भारत के साथ होता। सरदार पटेल ने विस्थापितों को बसाने की समस्या का भी बड़ी सूझबूझ से समाधान किया। परंतु देश का दुर्भाग्य था कि क्रूर काल ने लौह पुरुष को हमसे छीन लिया। 5 सितंबर, 1950 को उन्होंने सदा के लिए आंखें बंद कर लीं। उनके निधन पर पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “इतिहास सरदार पटेल को आधुनिक भारत का निर्माता और भारत का एकीकरण करने वाले नेता के रूप में सदैव याद रखेगा। वे स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनापति थे।”

भारतीय राजनीति में सरदार वल्लभभाई पटेल एक अद्वितीय महापुरुष थे। यदि इनकी रीति-नीति, प्रबंध पटुता, प्रशासनिक क्षमता एवं दूरदर्शिता को उनके कार्यकाल में ही स्वीकार कर लिया गया होता, तो शायद भारत को आज इतनी परेशानी न उठानी पड़ती। सरदार पटेल कष्ट उठाने वाले तथा दुख-सुख को समान समझने वाले व्यक्ति थे। कार्य करना ही उनकी पूजा थी। उनकी राष्ट्र सेवा अतुलनीय है। वे भारतीय इतिहास में सदा अमर हैं। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, “स्वतंत्रता प्राप्त करने हेतु सत्याग्रह के क्षेत्र में और आजादी मिलने के प्रारंभिक वर्षों में सरदार पटेल की राष्ट्र सेवाएं ऐसी सफलताएं हैं, जो भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएंगी।”

600-700 Words Essay speech on Sardar Vallabhbhai Patel

Sardar Vallabhbhai Patel Quotes: सरदार पटेल के अनमोल विचार-

आज हमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेदभावों को समाप्त कर देना चाहिए।

मनुष्य को ठंडा रहना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए। लोहा भले ही गर्म हो जाए, हथौड़े को तो ठंडा ही रहना चाहिए अन्यथा वह स्वयं अपना हत्था जला डालेगा। कोई भी राज्य प्रजा पर कितना ही गर्म क्यों न हो जाये, अंत में तो उसे ठंडा होना ही पड़ेगा।

मेरी एक ही इच्छा है कि भारत एक अच्छा उत्पादक हो और इस देश में कोई अन्न के लिए आंसू बहाता हुआ भूखा ना रहे।

आपको अपना अपमान सहने की कला आनी चाहिए।

जब जनता एक हो जाती है, तब उसके सामने क्रूर से क्रूर शासन भी नहीं टिक सकता। अतः जात-पांत के, ऊँच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सब एक हो जाइए।

सेवा धर्म बहुत ही कठिन है यह तो कठिन काँटों के सेज पर सोने जैसा है।

संस्कृति समझ-बूझकर शांति पर रची गयी है। यदि मरना होगा, तो वे अपने पापों से मरेंगे। जो काम प्रेम व शांति से होता है, वह वैर-भाव से नहीं होता।

अक्सर मैं, ऐसे बच्चे जो मुझे अपना साथ दे सकते हैं, के साथ हंसी-मजाक करता हूँ। जब तक एक इंसान अपने अन्दर के बच्चे को बचाए रख सकता है तभी तक उसका जीवन उस अंधकारमयी छाया से दूर रह सकता है, जो इंसान के माथे पर चिंता की रेखाएं छोड़ जाती है।

अगर आपके पास शक्ति की कमी है तो विश्वास किसी काम का नहीं। क्योंकि महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, शक्ति और विश्वास दोनों का होना जरूरी है।

इस देश की मिट्टी में कुछ अलग ही बात है, जो इतनी कठिनाइयों के बावजूद हमेशा महान आत्माओं की भूमि रही हैं।

अगर हमारी करोड़ों की दौलत भी चली जाए या फिर हमारा पूरा जीवन बलिदान हो जाए तो भी हमें ईश्वर में विश्वास और उसके सत्य पर विश्वास रखकर प्रसन्न रहना चाहिए।

अविश्वास भय का प्रमुख कारण होता है।

आपके घर का प्रबंध दूसरों को सौंपा गया हो तो यह कैसा लगता है – यह आपको सोचना है जब तक प्रबंध दूसरों के हाथ में है तब तक परतन्त्रता है और तब तक सुख नहीं।

उतावले उत्साह से बड़ा परिणाम निकलने की आशा नहीं रखनी चाहिये।

एकता के बिना जनशक्ति, शक्ति नहीं है। जब तक उसे ठीक तरह से सामंजस्य में ना लाया जाए और एकजुट ना किया जाए।

कठिन समय में कायर बहाना ढूंढते हैं तो वहीं, बहादुर व्यक्ति रास्ता खोजते है।

कठोर-से-कठोर हृदय को भी प्रेम से वश में किया जा सकता है। प्रेम तो प्रेम है। माता को अपना काना-कुबड़ा बच्चा भी सुंदर लगता है और वह उससे असीम प्रेम करती है।

कर्तव्यनिष्ठ पुरूष कभी निराश नहीं होता। अतः जब तक जीवित रहें और कर्तव्य करते रहें, तो इसमें पूरा आनन्द मिलेगा।

किसी तन्त्र या संस्थान की पुनः निंदा की जाए तो वह ढीठ बन जाता है और फिर सुधरने की बजाय निंदक की ही निंदा करने लगता है।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भी यदि परतन्त्रता की दुर्गन्ध आती रहे, तो स्वतन्त्रता की सुगंध नहीं फैल सकती।

गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।

जब तक हमारा अंतिम ध्येय प्राप्त ना हो जाए तब तक उत्तरोत्तर अधिक कष्ट सहन करने की शक्ति हमारे अन्दर आये, यही सच्ची विजय है।

जो तलवार चलाना जानते हुए भी अपनी तलवार को म्यान में रखता है उसी को सच्ची अहिंसा कहते है।

स्वतंत्र भारत में कोई भी भूख से नहीं मरेगा। अनाज निर्यात नहीं किया जायेगा। कपड़ों का आयात नहीं किया जाएगा। इसके नेता ना विदेशी भाषा का प्रयोग करेंगे ना किसी दूरस्थ स्थान, समुद्र स्तर से 7000 फुट ऊपर से शासन करेंगे। इसके सैन्य खर्च भारी नहीं होंगे, इसकी सेना अपने ही लोगों या किसी और की भूमि को अधीन नहीं करेगी। इसके सबसे अच्छे वेतन पाने वाले अधिकारी इसके सबसे कम वेतन पाने वाले सेवकों से बहुत ज्यादा नहीं कमाएंगे और यहाँ न्याय पाना ना खर्चीला होगा, ना कठिन होगा।

हमारे देश में अनेक धर्म, अनेक भाषाए भी है लेकिन हमारी संस्कृति एक ही है।

जो मनुष्य सम्मान प्राप्त करने योग्य होता है, वह हर जगह सम्मान प्राप्त कर लेता है पर अपने जन्म-स्थान पर उसके लिए सम्मान प्राप्त करना कठिन ही है।

त्याग के मूल्य का तभी पता चलता है, जब अपनी कोई मूल्यवान वस्तु छोडनी पडती है। जिसने कभी त्याग नहीं किया, वह इसका मूल्य क्या जाने।

थका हुआ इंसान दौड़ने लगे तो स्थान पर पहुँचने के बजाय जान गंवा बेठता है, ऐसे समय पर आराम करना और आगे बढ़ने की ताकत जुटाना उसका धर्म हो जाता है।

प्राण लेने का अधिकार तो ईश्वर को है। सरकार की तोप या बंदूकें हमारा कुछ नहीं कर सकतीं। हमारी निर्भयता ही हमारा कवच है।

बेशक कर्म पूजा है किन्तु हास्य जीवन है। जो कोई भी अपना जीवन बहुत गंभीरता से लेता है। उसे एक तुच्छ जीवन के लिए तैयार रहना चाहिए। जो कोई भी सुख और दुःख का समान रूप से स्वागत करता है वास्तव में वही सबसे अच्छी तरह से जीता है।

बोलने में मर्यादा मत छोड़ना, गालियाँ देना तो कायरों का काम है।

ज्यादा बोलने से कोई फायदा नही होता है बल्कि सबकी नजरो में अपना नुकसान ही होता है।

हर जाति या राष्ट्र खाली तलवार से वीर नहीं बनता तलवार तो रक्षा-हेतु आवश्यक है, पर राष्ट्र की प्रगति को तो उसकी नैतिकता से ही मापा जा सकता है।

मान-सम्मान किसी के देने से नहीं मिलते, अपनी योग्यतानुसार मिलते हैं।

यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य हैं कि वह अनुभव करे कि उसका देश स्वतन्त्र हैं और देश की स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्त्तव्य हैं। अब हर भारतीय को भूल जाना चाहिए कि वह सिख हैं, जाट है या राजपूत। उसे केवल इतना याद रखना चाहिए कि अब वह केवल भारतीय हैं जिसके पास सभी अधिकार हैं, लेकिन उसके कुछ कर्तव्य भी हैं।

प्रजा का विश्वास, राज्य की निर्भयता की निशानी है।

विश्वास रखकर आलस्य छोड़ दीजिये, वहम मिटा दीजिये, डर छोड़िये, फूट का त्याग कीजिये, कायरता निकाल डालिए, हिम्मत रखिये, बहादुर बन जाइए, और आत्मविश्वास रखना सीखिए। इतना कर लेंगे तो आप जो चाहेंगे, अपने आप मिलेगा। दुनिया में जो जिसके योग्य है, वह उसे मिलता ही है।

शारीरिक और मानसिक शिक्षा साथ –साथ दी जाये, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षा इस तरह की हो जो छात्र के मन का, शरीर का, और आत्मा का विकास करे।

सच्चे त्याग और आत्मशुद्धि के बिना स्वराज नहीं आएगा। आलसी, ऐश-आराम में लिप्त के लिए स्वराज कहाँ। आत्मबल के आधार पर खड़े रहने को ही स्वराज कहते हैं।

सत्ताधीशों की सत्ता उनकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाती है, पर महान देशभक्तों की सत्ता मरने के बाद काम करती है, अतः देशभक्ति अर्थात् देश-सेवा में जो मिठास है, वह और किसी चीज में नहीं।

सत्य के मार्ग पर चलने हेतु बुरे का त्याग अवश्यक है, चरित्र का सुधार आवश्यक है।

सेवा करने वाले मनुष्य को विन्रमता सीखनी चाहिए, वर्दी पहन कर अभिमान नहीं, विनम्रता आनी चाहिए।

दुःख उठाने के कारण प्राय: हममें कटुता आ जाती है, द्रष्टि संकुचित हो जाती है और हम स्वार्थी तथा दूसरों की कमियों के प्रति असहिष्णु बन जाते हैं। शारीरिक दुःख से मानसिक दुःख अधिक बुरा होता है।

जीवन में जितना दुःख भोगना लिखा है उसे तो भोगना ही पड़ेगा तो फिर व्यर्थ में चिंता क्यू करना ?

Sardar Vallabhbhai Patel Quotes: सरदार पटेल के अनमोल विचार

FAQ

सरदार वल्लभभाई पटेल को क्या कहा जाता है?

 ‘लौह पुरुष’ यानी Iron Man Of India 

सरदार वल्लभ भाई पटेल कैसे थे?

लौहपुरुष’ सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ। वे खेड़ा जिले के कारमसद में रहने वाले झावेर भाई और लाडबा पटेल की चौथी संतान थे। 1897 में 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वल्लभ भाई की शादी झबेरबा से हुई।

पटेल को भारत रत्न कब दिया गया?

1991 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया 

सरदार पटेल को पहली बार कांग्रेस का अध्यक्ष कब नियुक्त किया गया था?

1931 में, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के कराची अधिवेशन में

सरदार वल्लभभाई पटेल का छत्तीसगढ़ आगमन कब हुआ था?

1936

सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत का बिस्मार्क क्यों कहा जाता है?

कुशल कूटनीति और ज़रूरत पड़ने पर सैन्य हस्तक्षेप के जरिए सरदार पटेल ने उन अधिकांश रियासतों को तिरंगे के तले लाने में सफलता प्राप्त की। इसी उपलब्धि के चलते उन्हें लौह पुरुष या भारत का बिस्मार्क की उपाधि से सम्मानित किया गया।

बिस्मार्क का पूरा नाम क्या है?

ओटो एडुअर्ड लिओपोल्ड बिस्मार्क

भारत की सबसे बड़ी मूर्ति जो सरदार वल्लभ भाई पटेल की बनी है, वो कहाँ स्थित है?

भारत की सबसे बड़ी मूर्ति जो सरदार वल्लभ भाई पटेल की बनी है यह सरदार सरोवर बांध से 3.2 किमी की दूरी पर साधू बेट नामक स्थान पर है जो कि नर्मदा नदी पर एक टापू है। यह स्थान भारतीय राज्य गुजरात के भरुच के निकट नर्मदा जिले में स्थित है। यह विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति है, जिसकी लम्बाई 182 मीटर (597 फीट) है।

हिंदुस्तान में सबसे ऊंची मूर्ति किसकी है?

हिंदुस्तान की सबसे बड़ी मूर्ति जो सरदार वल्लभ भाई पटेल की बनी है यह सरदार सरोवर बांध से 3.2 किमी की दूरी पर साधू बेट नामक स्थान पर है जो कि नर्मदा नदी पर एक टापू है। यह स्थान भारतीय राज्य गुजरात के भरुच के निकट नर्मदा जिले में स्थित है। यह विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति है, जिसकी लम्बाई 182 मीटर (597 फीट) है।

पटेल का गोत्र क्या है?

पाटीदार

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कितनी रियासतों को एक किया?

सरदार पटेल ने स्वतंत्र भारत की 562 रियासतों का भारतीय संघ में विलय कर भारत की एकता को एक नया आयाम दिया था.

राष्ट्रीय एकता दिवस कब और क्यों मनाया जाता है?

राष्ट्रीय एकता दिवस (National Unity Day) हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाता है. भारत के लौह पुरुष – सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को मनाने के लिए भारत सरकार द्वारा साल 2014 में इस दिन की शुरुआत की गई थी.

पटेल जी कौन से गांव के रहने वाले थे?

पटेल का जन्म नडियाद, गुजरात में एक लेवा पटेल(पाटीदार) जाति में हुआ था। वे झवेरभाई पटेल एवं लाडबा देवी की चौथी संतान थे।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की मौत कैसे हुई?

दिल का दौरा पड़ने से

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मै आशा करती हूँ कि  सरदार वल्लभभाई पटेल  पर लिखा यह निबंध ( सरदार वल्लभभाई पटेल  पर  600-700 शब्दों में  निबंध,भाषण । 600-700 Words Essay speech on Sardar Vallabhbhai Patel in Hindi ) आपको पसंद आया होगा I साथ ही साथ आप यह निबंध/लेख अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ जरूर साझा ( Share) करेंगें I

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नमस्कार , मेरा नाम अंजू वर्मा है | मै उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव से हूँ | मै हिंदी भाषा में पोस्ट ग्रेजुएट हूँ| हिंदी साहित्य में मेरा जुड़ाव बचपन से ही रहा है इसीलिए मैंने परास्नातक के लिये हिंदी को ही एक विषय के रूप में चुना |अंग्रेजी के इस दौर में जहाँ हिंदी एक स्लोगन बनता जा रहा है जबकि जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा हिंदी भाषी है |लेकिन हम अंग्रेजी बोंलने को एक हाई सोसाइटी से जुड़ाव का माध्यम मानने लगे हैं | मुझे कुकिंग, घूमने एवम लिखने का शौक है मै ज्यादातर हिंदी भाषा , मोटिवेशनल कहानी, और फेमस लोगों के बारे में लिखती हूँ |

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