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रामधारी सिंह ‘दिनकर’ पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण । 600-700 Words Essay speech on Ramdhari Singh Dinkar  in Hindi

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण । 600-700 Words Essay speech on Ramdhari Singh Dinkar  in Hindi

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ से जुड़े छोटे निबंध जैसे रामधारी सिंह ‘दिनकर’पर  600-700 शब्दों में  निबंध,भाषण  स्कूल में कक्षा 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11,और 12 में  पूछे जाते है। इसलिए आज हम  600-700 Words Essay speech on Ramdhari Singh Dinkar  in Hindi के बारे में बात करेंगे ।

600-700 Words Essay Speech on Ramdhari Singh Dinkar  in Hindi for Class 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 & 12

‘पद्मभूषण’, ‘भारतीय ज्ञानपीठ’, ‘राष्ट्रीय अकादमी’ एवं ‘राष्ट्रकवि’ आदि सम्मानों से विभूषित तथा तत्कालीन साहित्यकारों में स्थापित रामधारी सिंह ‘दिनकर’ प्रगतिवादी युग के शीर्ष कवि थे। इनकी सभी कविताएं गेय है तथा सरल एवं सरस भाषा में गूढ़ तत्व लिए हुए हैं। इनकी काव्य शैली ओजपूर्ण है, जो हृदय के तंतुओं को झंकृत कर देती है। एक उदाहरण देखिए

मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

कविवर दिनकर का जन्म 30 सितंबर, 1908 को बिहार प्रांत के बेगूसराय जिलांतर्गत सिमरिया घाट नामक गांव में एक अति सामान्य किसान परिवार में हुआ था। इनमें बचपन ‘कवित्व शक्ति थी। ‘वीर बाला’ और ‘प्रणभंग’ इनकी किशोरावस्था के खंड काव्य हैं। लेकिन ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’ काव्यों की रचना ने इन्हें हिंदी साहित्य जगत में राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया। उसके बाद अबाध गति से ‘रसवंती’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘कामधेनु’, ‘बापू’, ‘पंछाह’, ‘रश्मि रथी’, ‘नील कुसुम’, ‘उर्वशी’, ‘परशुराम की प्रतिज्ञा’, ‘हारे को हरिनाम’ आदि श्रेष्ठ काव्य कृतियां इनकी लेखनी से नि:सृत हुईं। ‘उर्वशी’ को श्रेष्ठ काव्य माना गया और इस कृति पर इन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ से 1973 में सम्मानित किया गया।

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न दिनकर की लेखनी समय के अनुरूप चलती थी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ये गरम दल के समर्थक थे। इसलिए इनकी लेखनी ‘रेणुका’ काव्य में हिमालय से कहती है कि हमें भीम और अर्जुन को लौटा दे, ताकि हम अपने दुश्मनों से लोहा ले सकें

रे रोक! युधिष्ठिर को न यहां, जाने दो उनको स्वर्ग धीर, पर फिरा हमें गांडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

दिनकर जी का अधिकांश जीवन अभावग्रस्त रहा, इसीलिए शोषितों और पीड़ितों के दर्द को उन्होंने अपने काव्य में उचित स्थान दिया। अग्रलिखित पंक्तियों में सामाजिक विषमता का जीवंत चित्रण हैI

स्वानों को मिलता दूध-वस्खे बच्चे हैं, मां की हड्डी से चिपक-ठिठुर, जाड़े की रात बिताते हैं।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

ऐसे ही शोषकों के विरुद्ध दिनकर की कलम हुंकार कर उठती है

हटो व्योम के मेष पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं, दूध-दूध ओ वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

आजादी के बाद जब कविवर दिनकर जी को लगा कि हमारे नेता जनता का कार्य न करके भोग और विलास में आकंठ डूबे हुए हैं, तब उनकी लेखनी सिंहासनस्थ लोगों को इस प्रकार आगाह करती है

दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

समाज में किसे सम्मानित किया जाए-गुण या वेश को ? प्रारंभ से ही हमारे समाज का यह विचारणीय प्रश्न रहा है। राष्ट्रकवि दिनकर की प्रगतिवादी लेखनी इसका स्पष्ट निराकरण करती है

किसी वृंत पर खिले, विपिन में, पर नमस्य हैं फूल, सुधी खोजते नहीं गुणों का, आदि शक्ति का मूल

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

और अंत में भारतीय संस्कृति के अनुरूप दिनकर जी सांसारिकता से थककर एक दर्शनिक बन जाते हैं। ‘हारे को हरिनाम’ कविता की पंक्तियां उनके इसी व्यक्तित्व की ओर इशारा करती हैं

राम तुम्हारा नाम कंठ में रहे, हृदय जो कुछ भेजो वह सहे, दुख से त्राण नहीं मांगूं, मांगूं केवल शक्ति दुख सहने की।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

काव्य के तीन गुण माने जाते हैं-सादगी, असलियत और जोश। दिनकर जी की रचनाओं में ये तीनों गुण समान रूप से विद्यमान हैं। इसके अलावा देश •प्रेम और राष्ट्रीयता उनके काव्य के प्राण हैं। साथ ही श्रंगार, प्रेम, दर्शन आदि इनके काव्य के प्रमुख अवयव हैं, जो इनकी लोकप्रियता बढ़ाते हैं।

600-700 Words Essay speech on Ramdhari Singh Dinkar

रामधारी सिंह दिनकर के अनमोल विचार – Ramdhari Singh Dinkar Quotes in Hindi

“पाते है सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर , जाति – जाति का शोर मचाते केवल कायर क्रूर । ”

“ मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का , चिता का धूलिकण हूँ , क्षार हूँ मै ”

“ सतत चिन्ताशील व्यक्ति का कोई मित्र नही बनता ”

“ मूल जानना बड़ा कठीन है नदियो का वीरो का , धनुष छोड़ कर और गोत्र क्या होता रणधीरो का । ”

“ कविता वह सुरंग है जिसमें से गुजर कर मानव एक संसार को छोड़कर दूसरे संसार मे चला जाता है । ”

“ बरसो बाद मिले तुम हमको आओ जरा विचारें , आज क्या है कि देख कौम को गम है ।

कौम – कौम का शोर मचा है , किन्तु कहो असल में , कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगन है । ”

“ छोडो मत अपनी आन , शीश कट जाए , मत झुको अनय पर , भले व्योम फट जाये , दो बार नही यमराज कण्ठ धरता है , मरता है जो एक ही बार मरता है । ”

“ तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे , जीना हो तो मरने से नही डरो रे । ”

“ कल में लगाना जानते हो , तो जरूर लगाओ , मगर ऐसी कि फलो मे , अपनी मिट्टी का स्वाद रहे । ”

“ जब नाश मनुष्य पर छाता है , पहले विवेक मर जाता है । ”

“ यह देख , गगन मुझमे लय है , यह देख , पवन मुझमे लय है , मुझमे विलीन झंकार सफल , मुझमे लय है संसार सफल , अमरत्व फूलता है मुझमे , संहार झूलता है मुझमें । ”

“ स्वार्थ हर तरह की भाषा बोलता है हर तरह कि भूमिका अदा करता है , यहाँ तक की वह निःस्वार्थ की भाषा भी नही छोड़ता । ”

“ जिस मिट्टी ने लहू पिया , वह फूल खिलायेगी ही , अम्बर पर घन बन छायेगा ही उच्छवास तुम्हारा और अधिक ले जाँच , देवता इतना क्रूर नही है , थककर बैठ गये क्या भाई , मंजिल दूर नही है । ”

“ अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है , पौरूप का आंतक मनुज , कोमल होकर खोता है । ”

“ ऊंच – नीच का भेद न माने । ”

“ क्षमा शोभती उस भुंजग को , जिसके पास गरल हो , उसको क्या जो दन्तहीन , विषरहित , विनित , सरल हो । ”

“ वर्षो तक वन मे घूम – घूम , बाधा – विहनो को चूम – चूम ,सह , धूप घाम , पानी पत्थर , पांडव आये कुछ और निखरा , सौभाग्य न सब दिन सोता है , देखे , आगे क्या होता है । ”

“ थर – थर तीनो लोक कांपते थे जिनकी ललकारो पर , स्वर्ग नाचता था रण मे जिनकी पवित्र ललकारो पर , हम उन वोरो की सन्तान , जियो – जियो अय हिन्दूस्तान । ”

पीकर जिनकी लाल शिखाएं , उगल रही सौ लपट दिशायें , जिनके सिहंनाद से सहमी , धरती रही अभी तक डोल, कलम आज उनकी जय बोल ।

“ शत्रु से मै खुद निबटना जानता हूँ , मित्र से पर देव ! तुम रक्षा करो । ”

जिहा से कढ़ती ज्वाल सघन , सांसो मे पाता जन्म पवन , पड जाती मेरी दृष्टि जिधर , हंसने लगती है सृष्टि उधर !

मै जभी मूंदता हूँ लोचन , छा जाता चारो ओर मरन ।

रात यो कहने लगा मुझसे गगन का चाँद , आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है । उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता , और फिर बेचैन हो जगता , न सोता है । ”  

“ सौदर्य के तूफान मे वृद्धि को राह नही मिलती , वह खो जाती है , भटक जाती है , यह पुरूष की चिरंतन वेदना है । ”

“ हम सपूत उनके जो नर थे अनल और मधु मिश्रण , जिसमे नर का तेज प्रखर था , भीतर था नारी का मन । ”

“ हुंकारो से महलो को नीव उखड़ जाती है , सांसो के बल से ताज हवा मे उड़ता है , जनता की रोके राह , समय मे ताव कहाँ ? वह जिधर चाहती , काल उधर ही मुड़ता है । ”

“ हम सपूत उनके जो नर थे अनल और मधु मिश्रण , जिसमे नर का तेज प्रखर था , भीतर था नारी का मन । ”

“ लगा राजनीतिज्ञ रहा , अगले चुनाव पर घात , राजपुरूष सोचते किन्तु , अगली पीढी की बात । ”

“ पूछो मेरी जाति , शक्ति हो तो , मेरे भुजबल से रवि – समान दीपित , ललाट से और कवच – कुण्डल से पढ़ो उसे जो झलक रहा है । ”

“ क्षत्रिय वही भरी हो जिसमे निर्भयता की आग सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्माण है , हो जिसमे तप त्याग । ”

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

FAQ

रामधारी सिंह दिनकर की कविता का नाम क्या है?

रामधारी सिंह दिनकर की कविता -उर्वशी, रश्मिरथी, रेणुका, संस्कृति के चार अध्याय, हुंकार, सामधेनी, नीम के पत्ते

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म स्थान क्या है?

कविवर दिनकर का जन्म 30 सितंबर, 1908 को बिहार प्रांत के बेगूसराय जिलांतर्गत सिमरिया घाट नामक गांव में हुआ था।

रामधारी सिंह दिनकर के माता पिता का नाम क्या था?

रामधारी सिंह दिनकर के माता पिता का नाम मनरूप देवी और बाबू रवि सिंह थाI

कौन एक राष्ट्रकवि कहा जाता है?

एक मैथिलीशरण गुप्त, और दूसरे रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को राष्ट्रकवि कहा जाता हैI

रामधारी सिंह दिनकर किस युग के कवि हैं?

रामधारी सिंह दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में जाने जाते  हैं।

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मै आशा करती हूँ कि  रामधारी सिंह ‘दिनकर’ पर लिखा यह निबंध ( रामधारी सिंह ‘दिनकर’ पर  600-700 शब्दों में  निबंध,भाषण । 600-700 Words Essay speech on Ramdhari Singh Dinkar  in Hindi ) आपको पसंद आया होगा I साथ ही साथ आप यह निबंध/लेख अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ जरूर साझा ( Share) करेंगें I

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