X

मुंशी प्रेमचंद पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण । 600-700 Words Essay speech on Munshi Premchand  in Hindi

मुंशी प्रेमचंद पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण – 600-700 Words Essay speech on Munshi Premchand  in Hindi

मुंशी प्रेमचंद से जुड़े छोटे निबंध जैसे मुंशी प्रेमचंदपर  600-700 शब्दों में  निबंध,भाषण  स्कूल में कक्षा 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11,और 12 में  पूछे जाते है। इसलिए आज हम  600-700 Words Essay speech on Munshi Premchand  in Hindi के बारे में बात करेंगे ।

Table of Contents

600-700 Words Essay Speech on Munshi Premchand  in Hindi for Class 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 & 12

हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक लेखक हुए हैं, जो अपनी रचनाओं के कारण अमर हो गए, यथा- -भारतेंदु हरिश्चंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, आचार्य शिव पूजन सहाय आदि। इन लेखकों में सिर्फ मुंशी प्रेमचंद ने ही अपनी रचनाओं का मुख्य केंद्र हमेशा ग्रामीण परिवेश के इर्द-गिर्द रखा है। इनकी रचनाओं से गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू आती है। भारत की आत्मा गांवों में बसती है और हमारी संस्कृति भी ग्रामीण है। अतः मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं लोगों को काफी अच्छी लगती हैं तथा मर्मस्थल को स्पर्श करती हैं। इसलिए मुंशी प्रेमचंद एक लोकप्रिय लेखक हैं।

प्रेमचंद का व्यक्तिगत जीवन भी प्रेरणादायक रहा है। इनका जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लम्ही गांव में हुआ था। बचपन में ही इन्हें माता-पिता का बिछोह तथा विमाता की निष्ठुरता का दर्द सहना पड़ा। इसके अतिरिक्त झगड़ालू पत्नी का भी साथ रहा। फिर भी वे अपने सृजन-मार्ग से विचलित नहीं हुए। इनका वास्तविक नाम धनपत राय था। लेकिन नाम के विपरीत धन उनसे कोसों दूर था। धन के अभाव में ये अपना इलाज तक नहीं करा पाते थे। अंततः अभावों में जीते हुए इन्होंने 8 अक्टूबर, 1936 को हमेशा के लिए इस संसार से आंखें मूंद लीं। ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद इन्होंने सृजनशीलता की लौ आजीवन प्रज्वलित रखी।

मुंशी प्रेमचंद के समय भारत अंग्रेजों की गुलामी से त्रस्त था। साथ ही उस समय भारतीय समाज में तरह-तरह की कुरीतियों का भी बोलबाला था। प्रेमचंद की लेखनी ने इन पर तीखे प्रहार किए। ‘सोजे-वतन’ में छपी उनकी पहली कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रत्न’ की ये पंक्तियां देखिए-“खून का वह आखिरी कतरा, जो वतन की हिफाजत में गिरे, दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।” इस कहानी में राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है।

इसके अलावा ‘नमक का दारोगा’, ‘पंच परमेश्वर’ तथा ‘कफन’ आदि कहानियों के माध्यम से प्रेमचंद ने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर जबरदस्त कुठाराघात किया है। ‘नमक का दारोगा’ नामक कहानी को ये पंक्तियां उल्लेखनीय हैं, जो हमारे समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार का सजीव चित्रण करती हैं—”मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और फिर घटते-घटते लुप्त हो जाता है। लेकिन ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है, जिससे सदैव प्यास बुझती रहती है।”

‘पंच परमेश्वर’ नामक कहानी में ‘पंच’ में परमेश्वर का वास कहा गया है। इसमें खाला जान द्वारा कही गई ये पंक्तियां हृदय को छू लेती हैं-“बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे ?”

‘कफन’ नामक कहानी की ये पंक्तियां तो सोई हुई मानवता को झकझोर देती हैं—”जिसे जीते जी तन ढकने को कपड़ा भी नसीब न हो, उसे मरने पर क्यों वस्त्रों में लपेटा जाए।”

भारतीय समाज की इस रूढ़ परंपरा पर इससे बड़ा आघात कोई भी समाज सुधारक नहीं लगा पाया। इन्होंने 300 से भी अधिक कहानियां लिखीं।

प्रेमचंद कथा सम्राट के साथ ही उपन्यास सम्राट भी थे। प्रेमचंद से पूर्व उपन्यासों में कल्पित कहानियां ही लिखी जाती थीं, जिनका सामाजिक जीवन तथा यथार्थ से कोई संबंध नहीं होता था। परंतु प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में नई दिशा दी। उन्होंने कथावस्तु के माध्यम से सामाजिक यथार्थ को चित्रित किया। इनकी कुछ कालजयी रचनाएं हैं-‘गोदान’, ‘गबन’, ‘कायाकल्प’, ‘निर्मला’, ‘सेवा सदन’ इत्यादि। प्रेमचंद के उपन्यासों में शोषितों की जीवन गाथा बड़े सशक्त ढंग से कही गई है। इनके पात्रों के कथन भी बड़े चुटीले होते थे।

मुंशी प्रेमचंद स्वयं को एक मजदूर मानते थे। वे कहा करते थे, “मैं मजदूर हूं। जिस दिन न लिखूं, उस दिन मुझे रोटी खाने का अधिकार नहीं है।” हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भारतीय समाज को राजनीति के माध्यम से जो चिंतन दिया, वही मुंशी प्रेमचंद ने अपनी लेखनी द्वारा दिया है। प्रेमचंद की रचनाएं हमेशा समाज को राह दिखाती रहेंगी।

मुंशी प्रेमचंद के अनमोल विचार और वचन -: Munshi Premchand Quotes in Hindi

# देश का उद्धार विलासियों द्वारा नहीं हो सकता। उसके लिए सच्चा त्यागी होना पड़ेगा।

# प्रेम की रोटियों में अमृत रहता है, चाहे वह गेहूं की हों या बाजरे की।

# इंसान सब हैं पर, इंसानियत विरलों में मिलती है।

# सफलता में दोषों को मिटाने की विलक्षण शक्ति है।

# आकाश में उड़ने वाले पंछी को भी अपना घर याद आता है।

# मै एक मज़दूर हूँ। जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं।

# मोहब्बत रूह की ख़ुराक है, यह वह अमृत है जो मरे हुए भावों को ज़िंदा कर देती है।

# लोग कहते हैं आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस निकालने से क्या होता है? इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित है।

# देह के भीतर इसीलिए आत्मा रखी गई है कि देह उसकी रक्षा करे। इसलिए नहीं कि उसका सर्वनाश कर दे। 

# बड़े-बड़े महान संकल्प आवेश में ही जन्म लेते हैं।

# निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।

# बल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद कोई नहीं सुनता।

# क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात कहने के बजाय दूसरों के ह्रदय को ज़्यादा दुखाता है।

# अंधी प्रशंसा अपने पात्र को घमंडी और अंधी भक्ति धूर्त बनाती है।

# भरोसा प्यार करने के लिए पहला कदम है।

# संतान वह सबसे कठिन परीक्षा है जो ईश्वर ने मनुष्य को परखने के लिए गढ़ी है।

# संसार में गऊ बनने से काम नहीं चलता, जितना दबो, उतना ही दबाते हैं।

# बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दुःखों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता।

# जब किसान के बेटे को गोबर में से बदबू आने लग जाए तो समझ लो कि देश में अकाल पड़ने वाला है।

# साक्षरता अच्छी चीज है और उससे जीवन की कुछ समस्याएं हल हो जाती है। लेकिन यह समझना कि किसान निरा मुर्ख है, उसके साथ अन्याय करना है।

# यह कितनी अनोखी लेकिन यथार्थ बात है कि सोये हुए मनुष्य को जगाने की अपेक्षा जागते हुए मनुष्य को जगाना कठिन है।

# सौभाग्य उन्हीं को प्राप्त होता है, जो अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग रहते हैं।

# कुल की प्रतिष्ठा सदव्यवहार और विनम्रता से होती है, हेकड़ी और रौब दिखाने से नहीं।

# क़ानून और हक़-ओ-इंसाफ़ ये सब दौलत के खिलौने हैं।

# आत्मसम्मान की रक्षा हमारा सबसे पहला धर्म और अधिकार है।

# दुनिया में विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई भी विद्यालय आज तक नहीं खुला है।

# न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं। इन्हें वह जैसे चाहती है, नचाती है।

# सफलता में दोषों को मिटाने की विलक्षण शक्ति है।

# अमीरी की कब्र पर उगी गरीबी बड़ी जहरीली होती है।

# मन एक डरपोक शत्रु है जो हमेशा पीठ के पीछे से वार करता है।

# जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए दर्पण बेकार है उसी प्रकार बुद्धिहीन के लिए विद्या बेकार है।

# विजयी व्यक्ति स्वभाव से बहिर्मुखी होता है। पराजय व्यक्ति को अन्तर्मुखी बनाती है।

# अब सब जने खड़े क्या पछता रहे हो। देख ली अपनी दुर्दशा, या अभी कुछ बाकी है। आज तुमने देख लिया न कि हमारे ऊपर कानून से नहीं, लाठी से राज हो रहा है। आज हम इतने बेशरम हैं कि इतनी दुर्दशा होने पर भी कुछ नहीं बोलते।

# हमारे यहाँ विवाह का आधार प्रेम और इच्छा पर नहीं, धर्म और कर्तव्य पर रखा गया है। इच्छा चंचल है, क्षण-क्षण में बदलती रहती है। कर्तव्य स्थायी है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

# क्रोध अत्यंत कठोर होता है। वह देखना चाहता है कि मेरा एक-एक वाक्य निशाने पर बैठा है या नहीं। वह मौन को सहन नहीं कर सकता। ऐसा कोई घातक शस्त्र नहीं है जो उसकी शस्त्रशाला में न हो, पर मौन वह मन्त्र है जिसके आगे उसकी सारी शक्ति विफल हो जाती है।

# मासिक वेतन पूर्णमासी का चाँद है। जो एक दिन दिखाई देता है और घटते ख़त्म हो जाता है।

# लिखते तो वह लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है! जिन्होंने धन और भोग-विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया, वह क्या लिखेंगे?

# अन्याय होने पर चुप रहना, अन्याय करने के ही समान है।

# धर्म की कसौटी मानवता है। जिस धर्म में मानवता को प्रधानता दी गयी है, बस उसी धर्म का मैं दास हूँ। कोई देवता हो, नबी या पैगंबर, अगर वह मानवता के विरुद्ध है तो उसे मेरा दूर से ही सलाम है।

# जिस बंदे को दिन की पेट भर रोटी नहीं मिलती, उसके लिए इज्‍जत और मर्यादा सब ढोंग है।

# चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुंचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी न जाएं।

# कोई अन्याय केवल इसलिए मान्य नहीं हो सकता कि लोग उसे परम्परा से सहते आये हैं।

# राष्‍ट्र के सामने जो समस्याएँ हैं, उनका सम्बन्ध हिन्‍दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई सभी से है। बेकारी से सभी दुखी हैं। दरिद्रता सभी का गला दबाये हुए है। नित नयी-नयी बीमारियाँ पैदा होती जा रही हैं। उसका वार सभी सम्‍प्रदायों पर समान रूप से होता है।

# औरतों को रूप की निन्दा जितनी अप्रिय लगती है, उससे कहीं अधिक अप्रिय पुरूषों को अपने पेट की निन्दा लगती है।

# दु:खी हृदय दुखती हुई आँख है, जिसमें हवा से भी पीड़ा होती है।

# दौलत से आदमी को जो सम्मान मिलता है, वह उसका सम्मान नहीं उसकी दौलत का सम्मान है।

# संतोष-सेतु जब टूट जाता है तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है।

# जो शिक्षा प्रणाली लड़के लड़कियों को सामाजिक बुराई या अन्याय के खिलाफ लड़ना नहीं सिखाती उस शिक्षा प्रणाली में ज़रूर कोई न कोई बुनियादी खराबी है।

# अपनी भूल अपने ही हाथों से सुधर जाए, तो यह उससे कहीं ज्यादा अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे।

# साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।

# कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता, कर्तव्य पालन में ही चित्त की शांति है।

# युवावस्था आवेशमय होती है, वह क्रोध से आग हो जाती है तो करुणा से पानी भी।

# प्रेम एक बीज है, जो एक बार जमकर फिर बड़ी मुश्किल से उखड़ता है।

# किसी को भी दूसरों के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं हैं। उपजीवी होना, घोर लज्जा की बात है। कर्म करना प्राणिमात्र का धर्म है।

# जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में है। उनका सुख छीनने में नहीं।

# डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूंगा हो जाता है।

# कार्यकुशल व्यक्ति की सभी जगह जरुरत पड़ती है।

# निर्धनता प्रकट करना निर्धन होने से अधिक दुखदायी होता है।

# आदमी का सबसे बड़ा शत्रु उसका अहंकार है।

# जिसकी आत्मा में बल नहीं, अभिमान नहीं, वह और चाहे कुछ हो, आदमी नहीं है।

# आशा उत्साह की जननी है, आशा में तेज है, बल है, जीवन है। आशा ही संसार की संचालक शक्ति है।

# सोने और खाने का नाम जिंदगी नहीं है, आगे बढ़ते रहने की लगन का नाम जिंदगी है।

# खुली हवा में चरित्र के भ्रष्ट होने की उससे कम संभावना है, जितना बन्द कमरे में।

# यह जमाना चाटुकारिता और सलामी का है तुम विद्या के सागर बने बैठे रहो, कोई सेत भी न पूछेगा।

# कभी-कभी हमें उन लोगों से शिक्षा मिलती है, जिन्हें हम अभिमान वश अज्ञानी समझते हैं।

# धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें, तो यह कोई महंगा सौदा नहीं है।

# सत्य की एक चिंगारी, असत्य के पहाड़ को भस्म कर सकती है।

# दूसरे के लिए कितना ही मरो, तो भी अपने नहीं होते। पानी तेल में कितना ही मिले, फिर भी अलग ही रहेगा।

# माँ की ‘ममता’ और पिता की ‘क्षमता’ का अंदाज़ा लगा पाना असंभव है।

# विचार और व्यवहार में सामंजस्य न होना ही धूर्तता है, मक्कारी है।

मुंशी प्रेमचंद के अनमोल विचार और वचन -: Munshi Premchand Quotes in Hindi
600-700 Words Essay speech on Munshi Premchand

FAQ

प्रेमचंद का प्रसिद्ध उपन्यास कौन है?

प्रेमचंद का प्रसिद्ध उपन्यास सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन से ज्यादा हैं I तथा उन्होंने कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं।

मुंशी प्रेमचंद की सबसे अच्छी कहानी कौन सी है?

मन्त्र
बड़े घर की बेटी
रानी सारन्धा
नमक का दरोगा
सौत
आभूषण
प्रायश्चित
कामना
मन्दिर और मसजिद

मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित पहला उपन्यास कौन सा है?

मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित पहला हिंदी उपन्यास सेवा सदन हैI

प्रेमचंद के कुल कितने उपन्यास हैं?

प्रेमचंद ने लगभग एक दर्जन उपन्यास लिखे हैं I

मुंशी प्रेमचंद की सबसे छोटी कहानी कौन सी है?

प्रेमचंद की लघु-कथाओं में – कश्मीरी सेब, राष्ट्र का सेवक, देवी, बंद दरवाज़ा, व बाबाजी का भोग प्रसिद्ध हैं।

प्रेमचंद की अंतिम कहानी का नाम क्या है?

प्रेमचंद की अंतिम कहानी गोदान थीI

प्रेमचंद पूर्व हिंदी कहानियों में सर्वश्रेष्ठ कहानी कौन सी है?

‘ठाकुर का कुआं’, ‘सवा सेर गेहूँ’, ‘मोटेराम का सत्याग्रह’,

प्रेमचंद ने कुल कितने नाटक लिखे?

प्रेमचंद ने कुल 3 नाटक लिखेI

गोदान उपन्यास के रचयिता कौन हैं?

गोदान उपन्यास के रचयिता प्रेमचंद हैंI

मुंशी प्रेमचंद का जन्म कब हुआ था?

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को हुआ थाI

प्रेमचंद की मृत्यु कब हुई थी?

प्रेमचंद की मृत्यु 8 अक्टूबर 1936 को हुई थीI

मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम क्या था?

मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। 

गोदान कब लिखा गया?

गोदान 1936 में लिखा गयाI

प्रेमचंद के पिता कौन थे?

प्रेमचंद के पिता अजायब लाल थे I

गोदान कौन सी विधा है?

उपन्यास | गोदान उपन्यास की रचना मुंशी प्रेमचंद ने सन 1936 में की थी।

प्रेमचंद के माता पिता का क्या नाम था?

प्रेमचंद के पिता अजायब लाल और माता आनंदी देवी थी I

प्रेमचंद का जन्म कहाँ हुआ था?

प्रेमचंद का जन्म लमही वाराणसी में हुआ था?

प्रेमचंद की पत्नी का क्या नाम था?

प्रेमचंद की पत्नी का नाम शिवरानी देवी थाI

प्रेमचंद के कितने बच्चे थे?

प्रेमचंद के 3 बच्चे थे, श्रीपत राय, अमृत राय, कमला देवी।

मुंशी प्रेमचंद का नाम मुंशी क्यों पड़ा?

कन्हैयालाल माणिकलाल  प्रेमचंद से उम्र में 7 साल बड़े थे, तो अपनी वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए पत्रिका के संपादन में उनका नाम प्रेमचंद से पहले जाए, जिसके चलते हंस के कवर पर संपादक के रूप में ‘मुंशी-प्रेमचंद’ नाम प्रिंट होकर जाने लगा।

यह भी पढ़ें :-

मदर टेरेसा पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण 

रानी लक्ष्मीबाई पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण 

जयशंकर प्रसाद पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण 

रवींद्रनाथ टैगोर पर  600-700 शब्दों में  निबंध, भाषण


मै आशा करती हूँ कि  मुंशी प्रेमचंद पर लिखा यह निबंध ( मुंशी प्रेमचंद पर  600-700 शब्दों में  निबंध,भाषण । 600-700 Words Essay speech on Munshi Premchand  in Hindi ) आपको पसंद आया होगा I साथ ही साथ आप यह निबंध/लेख अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ जरूर साझा ( Share) करेंगें I

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सैकण्डरी एजुकेशन की  नई ऑफिशियल वेबसाईट है : cbse.nic.in. इस वेबसाईट की मदद से आप सीबीएसई बोर्ड की अपडेट पा सकते हैं जैसे परिक्षाओं के रिजल्ट, सिलेबस,  नोटिफिकेशन, बुक्स आदि देख सकते है. यह बोर्ड एग्जाम का केंद्रीय बोर्ड है.

संघ लोक सेवा आयोग का एग्जाम कैलेंडर {Exam Calendar Of -UNION PUBLIC COMMISSION (UPSC) लिंक/Link

नमस्कार , मेरा नाम अंजू वर्मा है | मै उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव से हूँ | मै हिंदी भाषा में पोस्ट ग्रेजुएट हूँ| हिंदी साहित्य में मेरा जुड़ाव बचपन से ही रहा है इसीलिए मैंने परास्नातक के लिये हिंदी को ही एक विषय के रूप में चुना |अंग्रेजी के इस दौर में जहाँ हिंदी एक स्लोगन बनता जा रहा है जबकि जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा हिंदी भाषी है |लेकिन हम अंग्रेजी बोंलने को एक हाई सोसाइटी से जुड़ाव का माध्यम मानने लगे हैं | मुझे कुकिंग, घूमने एवम लिखने का शौक है मै ज्यादातर हिंदी भाषा , मोटिवेशनल कहानी, और फेमस लोगों के बारे में लिखती हूँ |

This website uses cookies.